भाजपा के नए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन को इस महीने के अंत तक औपचारिक रूप से पार्टी अध्यक्ष चुने जाने की उम्मीद है। हालांकि, उन्होंने अभी से ही पार्टी की कमान संभाल ली है। उनके सामने इस साल की पहले छह महीने में होने वाले अहम विधानसभा चुनावों की चुनौती है, जिनमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम शामिल हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, नितिन नबीन को दी गई बड़ी जिम्मेदारियों में भाजपा और आरएसएस के बीच तालमेल को मजबूत करना भी शामिल है। इसके लिए वे आरएसएस और उससे जुड़े विभिन्न संगठनों के प्रमुखों से कई बैठकें करेंगे। वे संघ परिवार के अलग-अलग संगठनों के प्रमुखों के साथ-साथ उनके संगठन सचिवों और संयुक्त सचिवों से भी मुलाकात करेंगे।
45 वर्षीय नितिन नबीन भाजपा के शीर्ष संगठनात्मक पद पर पहुंचने वाले सबसे युवा नेता हैं। वे बिहार से पांच बार विधायक रह चुके हैं और पहले मंत्री भी रहे हैं। उनसे यह भी उम्मीद की जा रही है कि वे केंद्र की भाजपा सरकार और भाजपा शासित राज्यों की सरकारों के बीच बेहतर और सक्रिय समन्वय सुनिश्चित करेंगे।
2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा और आरएसएस के रिश्तों में खटास आ गई थी। मई 2024 में द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस पर कहा था, “शुरू में हम सक्षम होंगे, थोड़ा कम होंगे, आरएसएस की जरूरत पड़ती थी… आज हम बढ़ गए हैं, सक्षम हैं… तो भाजपा अपने आप को चलाती है।”
लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे रह गई और सिर्फ 240 सीटें ही जीत सकी। इसके चलते केंद्र में सरकार बनाने के लिए उसे टीडीपी और जेडीयू जैसे सहयोगी दलों के सहारे रहना पड़ा। उसी समय यह चर्चा भी थी कि आरएसएस के कई कार्यकर्ता निराश थे और उन्होंने भाजपा के चुनाव अभियान में पहले जैसी सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।
सूत्रों के मुताबिक, बाद में दोनों संगठनों के बीच अलग-अलग स्तर पर कई बातचीत हुईं, जिसके बाद भाजपा और आरएसएस के रिश्ते दोबारा सामान्य हो गए। इसका असर यह हुआ कि आरएसएस कार्यकर्ता फिर से जमीनी स्तर पर सक्रिय हुए। सूत्रों का कहना है कि इसी का नतीजा हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत के रूप में सामने आया।
पिछले साल आरएसएस की स्थापना के 100 साल पूरे हुए। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित भाजपा के कई बड़े नेताओं ने आरएसएस, उसकी विचारधारा और देश के निर्माण में उसकी भूमिका की खुले तौर पर सराहना की।
भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी और आरएसएस के बीच मजबूत तालमेल सिर्फ लंबे समय के लिए ही नहीं, बल्कि आने वाले अहम विधानसभा चुनावों के लिए भी बहुत जरूरी है।
एक पार्टी सूत्र ने बताया कि आरएसएस के साथ अच्छे संबंधों से भाजपा को हमेशा चुनावों में फायदा मिला है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में चुनावों के लिए पार्टी को संघ के साथ मजबूत रिश्ते और बेहतर समन्वय की जरूरत है। इन राज्यों में विपक्षी इंडिया ब्लॉक की सरकारें हैं, जहां भाजपा को कड़ी चुनौती मिलेगी।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। इसके अलावा अमित शाह जैसे मजबूत रणनीतिकार और योगी आदित्यनाथ जैसे लोकप्रिय नेता भी पार्टी के पास हैं। अब पार्टी को जमीनी स्तर पर अपना संगठन और नेटवर्क मजबूत करना होगा, और इसके लिए भाजपा व आरएसएस के बीच मजबूत साझेदारी बेहद अहम है।
हालांकि नितिन नबीन का आरएसएस से कोई सीधा संबंध नहीं रहा है, जैसा कि उनके कई पूर्ववर्तियों का था, फिर भी माना जा रहा है कि वे संघ की नजर में पार्टी के शीर्ष पद के लिए तय मानकों को पूरा किया है। वे उच्च जाति के कायस्थ समुदाय से आते हैं।
नबीन को एक शांत स्वभाव के नेता के रूप में जाना जाता है और वे आम कार्यकर्ताओं के लिए आसानी से उपलब्ध रहते हैं। आरएसएस में लंबे समय तक काम कर चुके भाजपा के एक नेता ने कहा कि नबीन एक तटस्थ भूमिका निभा सकते हैं। उनके मुताबिक, संघ सामूहिक नेतृत्व में विश्वास करता है और संगठन को किसी एक व्यक्ति पर केंद्रित नहीं देखना चाहता। साफ छवि और अनुशासित व्यवहार वाला युवा नेता टीम के साथ मिलकर बेहतर काम कर सकता है।
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इस बीच, आरएसएस नेतृत्व अपनी संगठनात्मक संरचना में बदलाव पर भी विचार कर रहा है ताकि भाजपा के साथ तालमेल और मजबूत हो सके। सूत्रों के अनुसार, आरएसएस की शताब्दी के मौके पर बनाई गई एक समिति ने संगठन में बदलाव के लिए कई सुझाव दिए हैं। इनमें संघ की संरचना का पुनर्गठन और प्रांत प्रचारकों की जगह राज्य या क्षेत्र स्तर के प्रभारी नियुक्त करने का प्रस्ताव शामिल है।
फिलहाल, बड़े राज्यों में आरएसएस की व्यवस्था कई प्रांतों में बंटी हुई है और हर प्रांत की जिम्मेदारी एक प्रांत प्रचारक के पास होती है। एक सूत्र के अनुसार, करीब 50 प्रांत प्रचारकों की जगह अगर हर राज्य या क्षेत्र के लिए एक राज्य प्रचारक हो, तो टीम वर्क बेहतर होगा। इससे भाजपा नेतृत्व के साथ समन्वय भी ज्यादा आसान और प्रभावी हो सकेगा।
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