कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए देश को लॉकडाउन किया गया है। लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए सरकार ने “श्रमिक एक्सप्रेस” ट्रेनें चलाई हैं। लेकिन अब इसके किराए को लेकर सियासी घमासान शुरू हो गया है। प्रवासी मजदूरों को घर वापस लाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। जिसकी सुनवाई मंगलवार को की गई। द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस सुनवाई के दौरान जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र सरकार से किराए को लेकर सवाल पूछे तो सरकार की तरफ से मौजूद सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने इसे लेकर कोई जवाब नहीं दिया। सॉलिसिटर-जनरल ने कहा कि उनके पास टिकट किराए के अनुपात को साझा करने के कोई निर्देश नहीं है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स नाम की संस्था के सदस्य जयदीप छोकर ने प्रवासी मजदूरों को उनके घर वापस भेजने की मांग वाली याचिका दाखिल की थी। याचिका में जगदीप ने अदालत से देश भर में हजारों प्रवासियों की घर वापसी में मदद के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की थी। छोकर ने यह भी कहा कि प्रवासियों से सरकार द्वारा कोई किराया नहीं लिया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ को बताया कि परस्पर विरोधी दावों के कारण प्रवासी मजदूर दयनीय स्थिति में है। न्यायमूर्ति गवई ने “रिपोर्टों” का उल्लेख करते हुए कहा कि रेलवे ने 85 प्रतिशत किराया वहन करने का निर्णय लिया है। इसपर वकील ने कहा कि अगर यह सच है, तब भी प्रवासियों के लिए शेष 15 प्रतिशत देना मुश्किल होगा। आश्चर्य है कि रेलवे को यह राशि भी क्यों नहीं वहन करनी चाहिए।
न्यायमूर्ति कौल ने तब मेहता से पूछा कि क्या केंद्र वास्तव में किराया का 85 प्रतिशत दे रहा है। इसपर सॉलिसिटर-जनरल ने कहा कि उनके पास रेलवे और राज्यों द्वारा किराए के अनुपात को साझा करने के लिए कोई निर्देश नहीं है। मेहता ने पीठ से कहा, “मुझे इसे लेकर निर्देश नहीं मिले हैं। पूरे देश में कई ट्रेनों औरे बसों को उनके लॉजिस्टिक्स के आधार पर सेवा में रखा गया है।”
यह ध्यान देते हुए कि सरकार ने प्रवासियों को उनके मूल स्थानों पर ले जाने के लिए याचिकाकर्ता की मुख्य प्रार्थना को पूरा कर दिया है। पीठ ने एक लिखित आदेश पारित कर इस याचिका का निपटारा कर दिया। साथ ही कोर्ट ने इस बात पर आगे विचार करने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा, ”याचिका में जो मांग रखी गई थी, वह पहले ही पूरी हो चुकी है। अब इस मामले पर आगे सुनवाई की कोई जरूरत नहीं है। इसे बंद किया जाता है।”
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