नितिन नबीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं। उनकी उम्र महज 45 साल है और वह बीजेपी के सबसे युवा अध्यक्ष चुने गए हैं। कई पार्टी नेताओं को आपस में बात करते हुए एहसास हुआ कि नितिन नबीन ने कभी न कभी उनकी टीम में जूनियर सदस्य के तौर पर उनके साथ काम किया था। वहीं कुछ लोग उन्हें उस समय से जानते हैं जब वे करीब एक दशक पहले अनुराग ठाकुर के नेतृत्व में बीजेपी की युवा विंग में थे और अकसर दिल्ली के अशोक रोड पर बीजेपी के पुराने नेशनल ऑफिस में देखे जाते थे।

बीजेपी कर रही पीढ़ीगत बदलाव का प्रयोग

नितिन नबीन भले ही अब तक के सबसे युवा भाजपा के अध्यक्ष बने हैं, लेकिन इससे पहले भी पार्टी ने ऐसे कई अप्रत्याशित फैसले किए हैं। लेकिन नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने से एक बात तय हो गई कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पीढ़ीगत बदलाव के साथ एक नया प्रयोग कर रही है। यह एक ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा है जो पार्टी के 2014 में पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने के बाद शुरू हुई थी।

हाल के वर्षों में बीजेपी के मुख्यमंत्री और कैबिनेट पदों के लिए चुने गए कई नेता 55 साल से कम उम्र के हैं। इनमें राजस्थान के भजनलाल शर्मा, दिल्ली की रेखा गुप्ता और मध्य प्रदेश के मोहन यादव जैसे नाम शामिल हैं। एक बीजेपी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन लोगों से बहुत ज़्यादा कड़ी मेहनत और भागदौड़ की उम्मीद करते हैं जिन्हें वे ऊंचे पद देते हैं। यहां युवा नेताओं को फ़ायदा होता है, क्योंकि वे ज़्यादा आसानी से भागदौड़ कर सकते हैं। जिसे हर कुछ घंटों में गोली खानी पड़ती है, वह इस काम के लिए शायद सही नहीं होगा।”

55 साल से ज्यादा उम्र के सिर्फ़ 5 बीजेपी मुख्यमंत्री

14 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्रियों के विश्लेषण से पता चलता है कि उनमें से सिर्फ़ पांच ऐसे हैं जिनकी उम्र 55 से अधिक है। त्रिपुरा के माणिक साहा 70 साल के हैं। जबकि गुजरात के भूपेंद्र पटेल 60, छत्तीसगढ़ के विष्णु देव साई 59, मध्य प्रदेश के मोहन यादव 58 और राजस्थान के भजनलाल शर्मा 56 साल के हैं। बाकी 9 मुख्यमंत्रियों ने जब आखिरी बार शपथ ली थी तब उनकी उम्र 55 से कम थी। अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू 44 साल के थे, जब पिछली बार उन्होंने बीजेपी के सीएम के रूप में शपथ ली थी। असम के हिमंत बिस्वा सरमा 52, दिल्ली की रेखा गुप्ता 50, गोवा के प्रमोद सावंत 48, हरियाणा के नायब सिंह सैनी 54, महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस 54, ओडिशा के मोहन माझी 52, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ 49 और उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी 46 साल के थे। पिछले चार सालों में शपथ ग्रहण के समय BJP के मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र 54 साल थी।

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प्रदेश अध्यक्षों से साधा संतुलन

हालांकि पार्टी ने पार्टी प्रमुखों की नियुक्ति में संतुलन बनाया है, जिनमें से कई 55 साल से ज़्यादा उम्र के हैं। द इंडियन एक्सप्रेस के एक एनालिसिस से पता चलता है कि 20 प्रदेश अध्यक्ष 55 साल से ज़्यादा उम्र के थे और 14 अध्यक्ष 55 साल से कम उम्र के थे जब उन्हें इस पद के लिए चुना गया था। BJP के राज्य अध्यक्षों की औसत उम्र (जब उनके नामों की घोषणा की गई थी) 58 साल थी, जो मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र से ज़्यादा है। मौजूदा ज़्यादातर प्रदेश अध्यक्षों की घोषणा पिछले एक साल में हुए संगठनात्मक चुनावों के दौरान की गई थी।

एक बीजेपी नेता ने नाम न बताने की शर्त पर युवा मुख्यमंत्रियों और उम्रदराज पार्टी प्रमुखों की इस घटना के बारे में बताते हुए कहा, “पार्टी पूरी तरह से युवा पीढ़ी की तरफ शिफ्ट नहीं हो रही है, बल्कि अलग-अलग पदों पर उम्र के ग्रुप को मिलाने में विश्वास रखती है, जिससे युवाओं और अनुभव का सही तालमेल बनता है।”

असम और महाराष्ट्र को छोड़कर बीजेपी शासित दूसरे राज्यों में पार्टी ने मुख्यमंत्री से ज़्यादा उम्र के प्रदेश अध्यक्षों को नियुक्त करके युवा जोश और अनुभव के बीच संतुलन बनाया है। जब मार्च 2022 में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ली थी, तब उनकी उम्र 49 साल थी। जबकि नए नियुक्त यूपी बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी 61 साल के हैं। वहीं निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी 2022 में पदभार संभालने के समय 54 साल के थे।

असम एक अपवाद है, जहां इस साल जनवरी में दिलीप सैकिया को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। तब उनकी उम्र 51 साल थी, जबकि 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद जब बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद के लिए हिमंता सरमा का नाम तय किया था, तब उनकी उम्र 52 साल थी। हिमंता अभी 56 साल के हैं। इसी तरह महाराष्ट्र में भी एक युवा टीम है। पिछले साल शपथ ग्रहण के समय सीएम फडणवीस 54 साल के थे, और पार्टी ने इस साल जुलाई में 54 साल के मराठा नेता रवींद्र चव्हाण को अपना प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया।

दिल्ली में क्या है खास?

दिल्ली सबसे कम उम्र के मंत्रिमंडल के साथ सबसे अलग है। यहां औसत उम्र 50 साल है और शपथ ग्रहण के समय केवल एक मंत्री (आशीष सूद 58 साल) 55 साल से ज़्यादा उम्र के थे। अरुणाचल प्रदेश, असम और उत्तराखंड में भी युवा मंत्रिमंडल हैं, जिनमें ज़्यादातर मंत्री 55 साल से कम उम्र के हैं, जबकि उम्रदराज नेता मंत्रिमंडल में वरिष्ठ पदों पर बने हुए हैं। ओडिशा जैसे राज्य भी इसी तरह का पैटर्न है।

महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में मंत्रिमंडल समान रूप से बंटे हुए हैं। हालांकि मंत्रियों की उम्र 55 से अधिक है। जबकि गोवा और हरियाणा में युवा सीएम तो है लेकिन मंत्रिमंडल में 55 साल से अधिक उम्र के नेताओं का दबदबा है। BJP के 9 NDA शासित राज्यों में 15 डिप्टी CM हैं। जब उन्होंने शपथ ली थी, तब उनकी औसत उम्र 57 साल थी, जो पार्टी के मुख्यमंत्रियों की औसत उम्र (54) से ज़्यादा है।

अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और यूपी में BJP के डिप्टी सीएम अपने सीएम से ज़्यादा उम्र के थे। जून 2024 में जब मोदी सरकार ने शपथ ली थी, तब केंद्रीय मंत्रिपरिषद के विश्लेषण से पता चलता है कि पीएम मोदी सहित BJP के केंद्रीय मंत्रियों की औसत उम्र 59 साल थी।

केंद्रीय कैबिनेट में बीजेपी के सदस्यों में से 21 की उम्र 55 साल से ज़्यादा थी और सिर्फ पांच की उम्र 55 साल से कम थी। राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राव इंद्रजीत सिंह 74 साल के साथ सबसे उम्रदराज थे और उनके बाद प्रधानमंत्री मोदी 73 साल के थे। सबसे कम उम्र की मंत्री रक्षा निखिल खडसे थीं, जिनकी उम्र 37 साल थी। BJP के 35 राज्य मंत्रियों में से 21 की उम्र 55 साल से ज़्यादा थी, जबकि सिर्फ़ 14 की उम्र 55 साल से कम थी।

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बदलाव का दौर क्या कहता है?

पार्टी सूत्रों ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के समय भी बीजेपी ने टॉप पदों के लिए युवा नेताओं को चुना था। उदाहरण के लिए तब शिवराज सिंह चौहान सिर्फ़ 46 साल के थे जब उन्होंने लगभग दो दशक पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभाला था। 2019 में मोदी के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत तक जाने-माने चेहरे आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, एम वेंकैया नायडू और अनंत कुमार एक तरीके से रिटायर हो गए। अनंत कुमार का निधन 2018 में हुआ था जबकि जेटली और सुषमा स्वराज ने 2019 में आखिरी सांस ली। हालांकि, राजनाथ सिंह इस ट्रेंड को तोड़ते हुए बने हुए हैं।

बीजेपी के राज्यों के बड़े नेता (मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा) कुछ सालों तक बने रहे लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों तक, वे सभी अपने-अपने राज्यों से बाहर हो गए थे। शिवराज चौहान को लोकसभा चुनावों के बाद केंद्रीय मंत्री बनाकर दिल्ली भेज दिया गया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बदलाव और फेरबदल का मौजूदा दौर एक संदेश देने के लिए है कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी चेहरों को बदलती रहेगी और किसी को भी पावर बेस मजबूत नहीं करने देगी।

बदलाव के पीछे क्या है?

पार्टी सूत्रों का कहना है कि ये बदलाव (खासकर नितिन नबीन का चुनाव) पीएम मोदी की अथॉरिटी की मुहर है। उनका कहना है कि इस चुनाव से पीएम मोदी ने एक मज़बूत संदेश दिया है कि कौन किस पद पर रहेगा, यह तय करने का आखिरी अधिकार उन्हीं का है और लॉबी का दबाव और सिफारिशें काम नहीं करेंगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि पीएम मोदी एक आज़ाद चेहरा चाहते थे। नितिन नबीन न तो RSS के चुने हुए हैं और न ही किसी सीनियर नेता से जुड़े हैं और इसीलिए इस कसौटी पर खरे उतरते हैं।

एक बीजेपी नेता ने कहा कि इस तरह के अप्रत्याशित बदलाव पार्टी नेताओं को चौकन्ना रखने के लिए किए जाते हैं। उदाहरण के लिए शिवराज चौहान को 2023 में उनके नेतृत्व में बीजेपी के राज्य में शानदार जीत के बाद भी केंद्र में भेज दिया गया। इसके उलट पुष्कर सिंह धामी 45 साल की उम्र में 2021 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने, जबकि वह खटीमा से विधानसभा चुनाव हार गए थे। उन्हें 2022 में राज्य के चंपावत विधानसभा क्षेत्र से उपचुनाव में फिर से चुना गया। इसका संदेश यह भी है कि पिछला रुतबा या मीडिया में लोकप्रियता प्रमोशन का कोई पैमाना नहीं है। एक बीजेपी नेता कहते हैं, “पहले, नेता मीडिया फ्रेंडली बनने की कोशिश करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी लोकप्रियता उन्हें पार्टी में आगे बढ़ने में मदद करेगी। लेकिन अब वही लोकप्रियता ठहराव का कारण बन सकती है। अब जो मायने रखता है वह है नेतृत्व की गुड बुक्स में होना।”

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लेकिन वही नेता यह भी मानते हैं कि यह बीजेपी को कांग्रेस की तरह ही ‘हाई कमांड पार्टी’ बनाता है। जबकि पीएम मोदी और मास्टर रणनीतिकार अमित शाह के कॉम्बिनेशन ने बीजेपी को एक अच्छी तरह से चलने वाली चुनावी मशीन में बदल दिया है, वहीं एक मजबूत दूसरी पंक्ति के नेतृत्व की कमी बीजेपी के गढ़ों में पार्टी कार्यकर्ताओं को परेशान कर रही है। बीजेपी नेता अक्सर एक मजबूत दूसरी पंक्ति के खत्म होने पर सवाल उठाते हैं और डरते हैं कि इसका असर आखिरकार पार्टी पर पड़ेगा।

सूत्रों का कहना है कि नबीन की नियुक्ति से यह भी पता चलता है कि अब फैसले लेने का अधिकार काफी हद तक पार्टी और पीएमओ के पास है, न कि RSS के पारंपरिक सलाह-मशविरे के तरीकों के पास। वे बताते हैं कि कैसे 16 साल पहले जब नितिन गडकरी बीजेपी अध्यक्ष बने थे, तो यह व्यापक रूप से माना जाता था कि उनकी नियुक्ति संघ से उनकी नजदीकी के कारण हुई थी। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह बदलाव मोदी-शाह के तहत शुरू हुआ, और यहां तक कि नड्डा भी सीधे RSS की पसंद नहीं थे।

लेकिन नितिन नबीन को चुनकरल बीजेपी नेतृत्व ने संघ की एक शर्त पूरी कर दी है, जो 45 से 55 साल की उम्र के बीच के एक युवा नेता को शीर्ष पर देखना चाहता था। एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “उनकी छवि साफ है और वह किसी खास गुट या प्रभावशाली जाति से नहीं हैं (नबीन कायस्थ समुदाय से हैं)। इससे वह संघ और पार्टी नेताओं को सभी जातियों और वर्गों में स्वीकार्य होंगे।”

असली परीक्षा क्या है?

टॉप पदों के लिए लगभग अनजान लोगों को चुनने की BJP की रणनीति की असली परीक्षा इस बात में होगी कि ये उम्मीदवार पार्टी संगठन और केंद्रीय नेतृत्व दोनों में खुद को कितनी अच्छी तरह से स्थापित कर पाते हैं। अब तक पार्टी नेता मानते हैं कि राज्य सरकारों में टॉप पदों के लिए चुने गए कई चौंकाने वाले लोग कार्यकर्ताओं की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं।

एक सीनियर पार्टी पदाधिकारी मानते हैं, “योगीजी (उत्तर प्रदेश में), हिमंता सरमा (असम में) और फडणवीस (महाराष्ट्र में) को छोड़कर, बाकी लोग अपने राज्यों में अपना राजनीतिक दबदबा नहीं बना पाए हैं। धामी पार्टी में अपना नेतृत्व स्थापित करने में कामयाब रहे हैं। दूसरे राज्यों में अगर हम चुनाव में जाते हैं, तो भी यह मोदीजी के चेहरे पर ही होगा।”

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बीजेपी नेता कहते हैं कि नितिन नबीन के उदय के पीछे की असली तस्वीर तभी साफ होगी जब वह नए संगठन की घोषणा करेंगे। जबकि BJP नेताओं का एक वर्ग उम्मीद करता है कि पदाधिकारियों की पूरी तरह से युवा टीम पीढ़ीगत बदलाव को पूरा करेगी, लेकिन BJP के लिए उस दिशा में न जाना ही समझदारी होगी। उनका मानना है युवा और अनुभवी नेताओं का मिश्रण ही पार्टी को आगे ले जा पाएगा।

एक सीनियर पार्टी नेता कहते हैं, “यह एक ऐसी पार्टी है जो 140 करोड़ की आबादी पर शासन करती है। आपके पास पूरी तरह से नई टीम नहीं हो सकती। आपको अनुभवी हाथों की ज़रूरत है, आपको मिले-जुले लोगों की ज़रूरत है। नितिन नबीन तब तक टॉप नेतृत्व की छाया में रहेंगे जब तक वह खुद अपनी पहचान नहीं बना लेते। हमारी पार्टी की मौजूदा व्यवस्था में यह एक धीमी प्रक्रिया है।” पढ़ें भाजपा में कैसे होता है राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव?