Article 370 in Jammu and Kashmir: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करना संघ परिवार के तीन मुख्य मुद्दों में से एक है। बाकी दो मुद्दे यूनिफॉर्म सिविल कोड और राम मंदिर हैं। आरएसएस इस अनुच्छेद को हटाने की मांग करते हुए हमेशा यह कहता रहा है कि अनुच्छेद 370 कश्मीर को भारत से अलग करता है।  कश्मीर पर संघ परिवार की यह कवायद दशकों पुरानी है।

पचास के दशक से लेकर आज तक आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल  (ABKM), अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) और केंद्रीय कार्यकारी मंडल (KKM) ने अपने सालाना बैठकों में कश्मीर पर कुल 51 प्रस्ताव पास किए। इनमें से अधिकतर में अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग की गई। सोमवार को केंद्र सरकार के फैसले के बाद भले ही अनुच्छेद 370 पूरी तरह खत्म न हुआ तो लेकिन अब J&K का विशेष दर्जा खत्म हो चुका है।

जहां तक राज्य के बंटवारे का सवाल है, आरएसएस ने 1995 में इस विचार का समर्थन किया और अपने प्रस्ताव में मांग की थी कि जम्मू क्षेत्र को स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा मिले। बाद में 2002 में आरएसएस ने राज्य के बंटवारे की मांग को लेकर प्रस्ताव भी पास किया। हालांकि, आरएसएस की ओर से ऐसी कोई पहल सबसे पहले 1952 में हुई। संघ के केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक में कश्मीर पर एक प्रस्ताव पास हुआ जिसमें ‘पाकिस्तान और अमेरिका के बीच समझौते’ की निंदा की गई और कहा गया कि ‘घाटी में खुलेआम आक्रामकता’ जारी है।

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1953 में भारतीय जन संघ नेता बलराज मधोक के संगठन  J&K प्रजा परिषद ने एक अभियान शुरू किया। कश्मीर को भारत में पूरी तरह शामिल करने की मांग को लेकर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव भी पास किया गया। बाद में भारतीय जन संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 23 जून 1953 में श्रीनगर जेल में संदिग्ध हालत में मौत हो गई। वह आर्टिकल 370 का विरोध कर रहे थे। उनके प्रदर्शनों में संगठन का मुख्य नारा था- एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान, नहीं चलेगा।

1964 में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसका शीर्षक था ‘भारत की कश्मीर नीति।’ इसमें कहा गया था कि संविधान में अस्थाई प्रावधान के तौर पर शामिल किए गए आर्टिकल 370 को तुरंत खत्म करना चाहिए और अन्य राज्यों की तरह ही कश्मीर के साथ बर्ताव होना चाहिए।

1982 में जम्मू-कश्मीर सरकार ने एक बिल पास किया, जिसमें पाकिस्तान चले जाने वाले सभी कश्मीरी मुसलमानों के कश्मीर लौटने और उन्हें भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान था। इसके बाद, आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें कहा गया कि कश्मीर की विधानसभा आर्टिकल 370 का इस्तेमाल करके अलगाववादी और सांप्रदायिक मंसूबों को पूरा कर रही है। इस अनुच्छेद को खत्म करना चाहिए।

1984 में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल ने एक प्रस्ताव पास किया और जिसमें कहा गया कि आर्टिकल 370 अलगाववादी भावनाओं को भड़काने में इस्तेमाल हो रहा है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। वहीं, 1986 में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के प्रस्ताव में इस मांग को दुहाराया गया। 1993 में अखिल भारतीय कार्यकाली मंडल के पास किए गए प्रस्ताव में भी फिर से अनुच्छेद 370 पर निशाना साधा गया।

1995 में ABKM ने मांग की कि जम्मू क्षेत्र को ‘स्वायत्त काउंसिल’ का दर्जा दिया जाना चाहिए। वहीं, 1996 में एक प्रस्ताव पास करके ABKM ने कहा कि अस्थाई तौर पर लाया गया Article 370 पूरी तरह निरर्थक हो चला है। 2000 में जब बीजेपी केंद्र की सत्ता में पहुंची तो J&K विधानसभा ने एक प्रस्ताव पास करके स्वायत्त्ता की मांग की। वहीं, आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल ने एक प्रस्ताव ने पास करके कहा कि ऐसे हालात नहीं आते अगर आर्टिकल 370 को खत्म कर दिया जाता।

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2002 में संघ के ABKM ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें कहा गया, ‘जम्मू के नागरिकों को लगता है कि उनकी समस्याओं का हल जम्मू क्षेत्र के लिए अलग राज्य का दर्जा दिए जाने में निहित है।’ वहीं, 2010 में इस मामले पर आखिरी प्रस्ताव अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने पास किया था। इसमें कहा गया, ‘आर्टिकल 370 जिसे संविधान में अस्थाई तौर पर शामिल किया गया, यह निरस्त होने के बजाए यह अलगाववादी तत्वों का हथियार बन गया।’ हालांकि, 2014 में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार आने के बाद आरएसएस की ओर से अपनी बैठकों में कोई प्रस्ताव पास नहीं किया गया।