असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव में अपने प्रदर्शन से सबको चौंकाया है। पार्टी ने 29 महानगरपालिकाओं के 12 निगमों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। AIMIM इन चुनाव में 126 सीटें जीतकर एक ताकत के रूप में उभरी है। अगर हम निकाय चुनाव के नतीजे पर नजर डालें तो AIMIM अब महाराष्ट्र में राज ठाकरे की एमएनएस और शरद पवार की एनसीपी से बड़ी हो चुकी है। हालांकि लोकसभा और विधानसभा के मामले में शरद पवार से पार्टी से काफी पीछे है।

मुस्लिम वोटरों से क्या अपील कर रहे ओवैसी?

2014 में जब से भाजपा केंद्र की सत्ता में आई, उसके बाद से ही असदुद्दीन ओवैसी जनता और खासकर अपने मुस्लिम वोटरों से अपील कर रहे हैं कि जिन ‘सेकुलर दलों’ को आप वोट दे रहे हैं, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं रोक पाएंगे। शुरू के कुछ चुनाव में तो ओवैसी को सफलता नहीं मिली लेकिन बीते करीब 6 सालों में तेलंगाना के बाहर ओवैसी को अच्छी सफलता मिली है।

बिहार में ओवैसी ने दिखाया कमाल?

हाल ही में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए और ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी की पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि बाद में उनके पांच में से चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे। लेकिन बिहार की उन्हीं पांच सीटों पर इस बार ओवैसी की पार्टी ने फिर से जीत दर्ज कर ली। यह दर्शाता है कि जनता ओवैसी से कितनी जुड़ी है।

BMC में ओवैसी की पार्टी को मिली 8 सीट

वहीं ओवैसी का प्रदर्शन जैसा मुंबई निकाय चुनाव में रहा, इससे उत्तर प्रदेश में भी सरगर्मी बढ़ी है। दरअसल मुंबई में हुए बीएमसी चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने 8 वार्ड में जीत हासिल की। मुंबई में जो मुसलमान रहते हैं, उसमें से करीब 30 फ़ीसदी उत्तर भारतीय मुसलमान हैं। यहां पर समाजवादी पार्टी के विधायक और अध्यक्ष अबू आजमी काफी लोकप्रिय हैं और इसका फायदा उन्हें मिलता है। लेकिन इस बार AIMIM ने 8 सीटों पर जीत दर्ज की। AIMIM द्वारा जीते गए वार्ड साफ दर्शाते हैं कि मुंबई में रह रहे उत्तर भारतीय मुस्लिमों ने पार्टी को अच्छी संख्या में वोट दिया है।

‘महाराष्ट्र में AIMIM की जीत को धर्म के नजरिए से देखना गलत’, ओवैसी ने पूछा- ‘धर्मनिरपेक्ष पार्टियों’ के पास अब क्या बचा है?

मुंबई के वार्ड नंबर 136 अणुशक्ति नगर से AIMIM ने जीत हासिल की। वहीं वार्ड नंबर 137 न्यू गौतम नगर, वार्ड नंबर 134 मानखुर्द गांव, वार्ड नंबर 145 सहकार नगर, वार्ड नंबर 138, वार्ड नंबर 139, वार्ड नंबर 143 और वार्ड नंबर 140 से भी ओवैसी की पार्टी ने जीत दर्ज की। इससे साफ पता चला की शहरी मुस्लिम मतदाता अब पारंपरिक वोटिंग पैटर्न से हटकर नया विकल्प तलाश रहे हैं। AIMIM को मिले वोट इसका ताजा उदाहरण है।

RJD से गठबंधन को लेकर लिखा था पत्र

बिहार में तो विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी की पार्टी ने आरजेडी को गठबंधन के लिए पत्र लिखा था। ओवैसी बार-बार केवल 6 सीट मांग रहे थे। हालांकि आरजेडी ने उनसे गठबंधन नहीं किया और बाद में ओवैसी ने कई सीटों पर विपक्ष को नुकसान तो पहुंचाया और पांच सीटें अपनी झोली में भी डाल ली।

यूपी में क्या होगा?

अब बड़ा सवाल उठता है कि आने वाले दोनों में क्या ओवैसी समाजवादी पार्टी या बसपा को गठबंधन के लिए पत्र लिखेंगे या फिर उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव और आने वाले विधानसभा चुनाव में अपने दलबल के साथ अकेले मैदान में उतरेंगे? अभी तक उत्तर प्रदेश में ओवैसी को पंचायत या फिर विधानसभा में कोई खास सफलता नहीं मिली है। लेकिन महाराष्ट्र और बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए ओवैसी ने टेंशन जरूर बढ़ा दी है। 2014 के बाद से ही उत्तर प्रदेश का मुस्लिम समाजवादी पार्टी को एकतरफा वोट देते हुए आ रहा है।

अगर हम विधानसभा के नजरिए से देखें तो उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम आबादी है। ऐसी करीब 70 विधानसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है। इसमें से ज्यादातर सीटें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हैं। वहीं पूर्वांचल में भी कुछ विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फ़ीसदी से अधिक है। ऐसे में अगर ओवैसी की पार्टी वहां पर चुनाव लड़ती है तो सपा के लिए खतरा जरूर साबित हो सकती है।

‘हमारे कई हिंदू भाई भी कामयाब हुए…’, महाराष्ट्र में AIMIM की जीत से गदगद हुए असदुद्दीन ओवैसी

पारंपरिक दलों से क्यों हट रहे मुसलमान?

महाराष्ट्र चुनाव के नतीजों के बाद अखिलेश यादव ने अपने सांसदों की बैठक भी बुलाई है और पूरी संभावना है कि इसमें मुस्लिम वोट को लेकर भी चर्चा की जाएगी। हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में असदुद्दीन ओवैसी से पूछा गया कि मुस्लिम वोटरों का सेक्युलर पार्टियों से दूर जाने का एक निर्णायक बदलाव है, या यह पूरी तरह से स्थानीय घटना है? इसके जवाब में ओवैसी ने कहा था, “आप किस तरह की सेक्युलर पार्टियों की बात कर रहे हैं? मालेगांव में मुफ्ती साहब (मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक) हमारे विधायक हैं। गोविंदी में हमने आठ में से ज़्यादातर सीटें जीती हैं। औरंगाबाद में हमारे हिंदू उम्मीदवार ने जीत हासिल की है। आप हर चीज़ को सिर्फ़ एक धर्म के नजरिए से नहीं देख सकते। AIMIM की जीत को धर्म के नज़रिए से देखना गलत है। तो फिर आप BJP की जीत को क्या कहेंगे?

सपा और कांग्रेस से AIMIM में वोट शिफ्ट होने के सवाल पर ओवैसी ने कहा, “इसका जवाब सिर्फ़ वही दे सकते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है। हम अपना काम कर रहे हैं और लोग चुनने के लिए आज़ाद हैं। चुनाव पसंद या नापसंद जाहिर करने का सबसे अच्छा तरीका है। सपा – कांग्रेस वाले तीन बार हार चुके हैं और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हुए हैं। वे महाराष्ट्र में भी तीन बार हारे हैं। क्या उनके पास कोई जवाब है? आपके पास क्या बचा है? वोटरों को, खासकर युवाओं को यह एहसास हो गया है कि उन्हें एक ऐसी पार्टी चाहिए जो उनके विचारों को आगे बढ़ा सके और नई लीडरशिप को उभरने में मदद कर सके। मुस्लिम और दलित इलाके अच्छी तरह से डेवलप नहीं हैं। कई इलाकों में पांच दिन में एक बार पानी आता है और लोगों को पीने का पानी खरीदना पड़ता है। मुसलमानों के खिलाफ अत्याचारों पर सेक्युलर पार्टियों की चुप्पी भी नजरअंदाज नहीं हुई है। अकोला में मेरे काफिले को कुछ युवाओं ने रोका और उन्होंने मुझसे कहा कि वे हमें वोट देंगे। उन्होंने कहा कि जब अकोला में सांप्रदायिक दंगे हुए, तो सिर्फ़ AIMIM ही आई और उनकी मदद की। UAPA के तहत मुस्लिम युवाओं की जेल के बारे में कोई बात नहीं करता। ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से यह बदलाव आया है।”

2017 में AIMIM ने पहली बार यूपी में ठोकी थी ताल

अगर हम बीते चुनाव में उत्तर प्रदेश में AIMIM के प्रदर्शन की बात करें तो 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार पार्टी ने 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। AIMIM ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पर उसे हार नसीब हुई थी। पार्टी को तब 0.24 फीसदी वोट मिला था। 2017 में ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार रहे जियाउर रहमान बर्क तीसरे नंबर पर थे और यही उनकी पार्टी के लिए सबसे अच्छा प्रदर्शन था। यहां पर एआईएमआईएम को 59,336 वोट मिले थे। वर्तमान में बर्क समाजवादी पार्टी से संभल के सांसद हैं।

इसके बाद 2021 में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हुए थे और ओवैसी की पार्टी ने 23 जिला पंचायत सीटें जीत ली थी। हालांकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह आंकड़े काफी अच्छे नहीं थे। लेकिन पार्टी ने अपनी मौजूदगी दिखाई। लेकिन बीते कुछ सालों में एआईएमआईएम को हैदराबाद से बाहर सफलता मिली है। उत्तर प्रदेश में अप्रैल-मई 2026 में पंचायत चुनाव होने वाले हैं। ओवैसी की पार्टी पहले ही घोषणा कर चुकी है कि वह पंचायत चुनाव लड़ेगी। अब देखने लायक होगा कि AIMIM पंचायत चुनाव में कैसा प्रदर्शन करती है?

अखिलेश की नैया पार कर पाएगा PDA?

ओवैसी का वोट बैंक मुस्लिम है जबकि सपा के बारे में भी कहा जाता है कि मुस्लिम-यादव उसके कोर वोट बैंक हैं। बसपा के कमजोर होने के बाद और कांग्रेस-सपा के साथ आने के बाद 80 फ़ीसदी से अधिक मुसलमान अखिलेश के साथ खड़ा रहा है। लेकिन अगर ओवैसी एक विकल्प के तौर पर आते हैं तो जरूर इस वोट में सेंधमारी हो सकती है और इसका नुकसान भी अखिलेश को हो सकता है। ऐसे में आने वाले समय में अखिलेश कैसी रणनीति बनाते हैं, यह भी दिलचस्प होगा। अखिलेश ने PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का ऐलान तो कर दिया है और लोकसभा चुनाव में सफलता भी मिली, लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में हो PDA उनकी नैया पार लगा पाएगा या नहीं, यह वक्त बताएगा। पढ़ें कैसे महाराष्ट्र में राज ठाकरे-शरद पवार से आगे निकल गए ओवैसी?