बांग्लादेश में पिछले साल हुई राजनीतिक हलचल की गूंज एक बार फिर सुनाई पड़ी है। बांग्लादेश की अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई है। इससे संबंधित मामले की सुनवाई शेख हसीना की गैर मौजूदगी में हुई थी क्योंकि वो बांग्लादेश छोड़ने के बाद से भारत में हैं। अब बांग्लादेश सरकार का भारत से कहना है कि उसे शेख हसीना को बांग्लादेश को सौंप देना चाहिए।

हालांकि जानकारों का कहना है कि भारत ऐसा करने से परहेज करेगा। इन हालात में बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्त्व वाली अंतरिम सरकार अगले साल फरवरी में चुनाव कराना चाहती है। इससे जुड़े कई सवाल हैं, जैसे- भारत के लिए इस फैसले के क्या मायने हैं? क्या ये शेख हसीना की राजनीति का अंत है? क्या ये चीन और पाकिस्तान के लिए एक अवसर की तरह है? इसे लेकर क्या भारत को कूटनीतिक रुख अपनाना चाहिए?

भारत के लिए क्यों चिंता की बात?

हसीना सरकार के पतन के बाद से ही बांग्लादेश में भारत के प्रति नाराजगी की एक भावना है। ऐसे में भारत के लिए उसके साथ संबंध बढ़ाने में एक चुनौती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, रिश्ते बनाए रखने का प्रमुख तत्व है बातचीत जारी रखना, चाहे वहां बीएनपी हो, अवामी लीग हो या कोई और। ये बातचीत दोनों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों, विदेश मंत्रियों या अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हो। पिछले 15 महीनों में ऐसे कई मौके आए जब शीर्ष स्तर पर बातचीत नहीं हुई। ये एक दुखद बात है।

लेकिन एक और बात पर ध्यान देना जरूरी है। जो सत्ता के पुनर्गठन की कोशिश बांग्लादेश में हो रही है, उसमें प्रधानमंत्री के अलावा राष्ट्रपति के पास भी शक्तियां होंगी और वो भी काफी शक्तिशाली होंगे। ऐसे में भारत को उस ढांचे के साथ संवाद जारी रखना होगा।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के आने के बाद मोहम्मद यूनुस ने भारत पर निर्भरता को काफी कम करने की कोशिश की है। दोनों देशों के बीच कड़वाहट बढ़ी है जिसे चीन और पाकिस्तान अवसर की तरह देखते हैं। चीन और पाकिस्तान की कोशिश रहेगी कि बांग्लादेश में भारत के प्रभाव को कम किया जाए।

– रीवा गांगुली दास, बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त

बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त रीवा गांगुली दास ने कहा, न्यायिक प्रक्रिया के नतीजे से किसी को ताज्जुब नहीं हुआ, जिस तरह से इस कोर्ट को बनाया गया, बचाव पक्ष को अपने पसंद के वकील को नहीं लेने दिया गया, सरकार ने जिस वकील को नियुक्त किया, केस खत्म होने के बाद उनका एक वीडियो सामने आया जिसमें वो हंस-हंस कर बोल रहे हैं कि उन्हें मुकदमे के नतीजे से दुख हो रहा है। लग रहा था कि पूरा मामला ही फिक्स सा था। हालांकि इस फैसले का बांग्लादेश के छात्र नेताओं ने स्वागत किया।

लोगों से संपर्क की कोशिश कर रही हसीना

अब सवाल उठता है कि अपने खिलाफ फैसला आने के बाद क्या शेख हसीना के लिए सारे दरवाजे बंद हो गए हैं या अपने देश वापसी के लिए उनके सामने अब बस इंतजार करने का ही विकल्प बचा है?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे और भारत के पूर्व विशेष प्रतिनिधि एसडी मुनि कहते हैं, बांग्लादेश में अभी अवामी लीग के समर्थकों को कोई स्वतंत्रता नहीं है। सैकड़ों लोगों को जेल के अंदर डाल दिया गया है, हालांकि शेख हसीना लगातार बयान देकर अपने लोगों से संपर्क की कोशिश कर रही हैं। लेकिन एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि शेख हसीना की पूर्व सरकार बहुत लोकप्रिय नहीं रही है। जिस तरह विपक्ष का दमन किया गया और छात्रों के साथ बर्ताव किया गया, वे लोग अब बदला लेने के मूड में दिखाई देते हैं। ये ठीक नहीं है। कोर्ट उन्हें उम्र कैद की सजा भी दे सकती थी, लेकिन जिस तरह की सजा हुई है उस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

देखना होगा कि भारत अपनी वैचारिक और राजनीतिक धारा मजबूत करने के लिए वहां की घरेलू ताकतों को कहां तक लामबंद कर सकता है। जिसमें जातीय पार्टी, छात्रों की पार्टी और बीएनपी का एक धड़ा भी आता है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि जो उसकी मान्यताएं और हित हैं उन्हें बचाने के लिए बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में वो कहां तक अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।

-एसडी मुनि, जेएनयू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर

वो कहते हैं, शेख हसीना के साथ ज्यादती हो रही है और उसका कोई न्यायिक आधार नहीं है? ऐसे में हसीना अकेले तो कुछ नहीं कर सकती हैं। एक सूरत है कि अगर प्रतिबंध हटा दिए जाएं तो अवामी लीग उभर सकती है। वहां के लोग, यहां तक कि मोहम्मद यूनुस भी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की बात कर रहे हैं, ऐसे में आप पूरी अवामी लीग को चुनाव से कैसे बाहर कर सकते हैं। हालांकि शेख हसीना ने भी जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाया था और चुनाव से बाहर रखा था।

प्रोफेसर मुनि सवाल करते हैं कि शेख हसीना ने गलत किया था लेकिन बांग्लादेश की मौजूदा सरकार अगर वही काम करेगी तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को कैसे निभा पाएगी। वो कहते हैं, “अवामी लीग को मौका देना चाहिए तभी वो उभर सकती है और भारत के लिए उसका उभरना जरूरी है।”

‘यूनुस की बातों में विरोधाभास दिखता है’

प्रोफेसर मुनि का कहना है कि मोहम्मद यूनुस की ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर की है, वो अर्थशास्त्री हैं, लेकिन उन्हें बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी मिलकर चला रहे हैं। वो कहते हैं, यूनुस की बातों में विरोधाभास दिखता है। वो अंतरिम सरकार चार साल तक चलाना चाहते थे लेकिन बीएनपी के दबाव में चुनाव की घोषणा करनी पड़ी। इसके अलावा जिस समय शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा था, वो अमेरिका में बैठे हुए थे। वहीं, चीन और पाकिस्तान की कोशिश रहेगी कि बांग्लादेश में भारत के प्रभाव को कम किया जाए।

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