ईरान में पिछले कुछ दिनों से कट्टरपंथी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं। ये प्रदर्शन कई जगहों पर हिंसक भी हो चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि अब तक 2,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को धमकी दे रहे हैं और अमेरिकी हमले की चेतावनी भी दी जा रही है।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर अमेरिका सीधे तौर पर ईरान पर हमला करता है, तो मुस्लिम देशों का रुख क्या होगा। क्या ये देश खुलकर ईरान के समर्थन में आएंगे या दूरी बनाए रखेंगे?
जानकारों का मानना है कि मुस्लिम देशों का किसी एक मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट होना आसान नहीं है। गाजा संघर्ष के दौरान भी यही देखने को मिला था, जब कई देशों ने तटस्थ रुख अपनाया था। दरअसल, हर देश की अपनी आर्थिक मजबूरियां, सुरक्षा चिंताएं और कूटनीतिक प्राथमिकताएं होती हैं। इसी वजह से सभी देश किसी एक के समर्थन में खुलकर सामने नहीं आते।
अब समझते हैं कि अलग-अलग मुस्लिम देशों का ईरान के साथ कैसा रिश्ता है–
कतर लंबे समय से अमेरिका का सैन्य सहयोगी रहा है। कतर में अमेरिका का सबसे बड़ा एयरबेस मौजूद है, जहां इस समय करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तैनात हैं। ऐसे में अगर युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो कतर संतुलन साधने की कोशिश करेगा और किसी एक पक्ष के साथ खुलकर नहीं जाएगा।
इराक की स्थिति भी जटिल है। वहां अमेरिका की सैन्य मौजूदगी है और ईरान का भी राजनीतिक व सामाजिक प्रभाव रहा है। हालांकि, इराक की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। जानकार मानते हैं कि इराक खुलकर ईरान के समर्थन में नहीं आएगा और किसी नए टकराव से दूरी बनाए रखने की कोशिश करेगा।
तुर्की पिछले कुछ सालों में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ मुखर रहा है। गाजा संघर्ष के दौरान तुर्की सरकार के बयानों से यह साफ भी हुआ। कूटनीतिक तौर पर तुर्की ईरान के प्रति नरम रुख दिखा सकता है, लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि तुर्की नाटो का सदस्य है और अमेरिका के साथ उसके सैन्य रिश्ते हैं। ऐसे में अगर अमेरिका हमला करता है, तो तुर्की सीधे टकराव में जाने के बजाय मध्यस्थ की भूमिका निभाना पसंद कर सकता है।
पाकिस्तान का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वह आमतौर पर बड़े देशों के साथ सीधे टकराव से बचता है। आर्थिक संकट और सुरक्षा चुनौतियों के चलते पाकिस्तान अमेरिका के खिलाफ खुलकर खड़ा होने की स्थिति में नहीं है। हालांकि, वह मुस्लिम एकजुटता की बात जरूर करता है, लेकिन इसका मतलब सैन्य समर्थन से नहीं होता।
कुवैत हमेशा क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की नीति पर चलता रहा है। सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद कुवैत अमेरिका और सऊदी अरब का रणनीतिक सहयोगी है। ऐसे में कुवैत भी किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संतुलित और तटस्थ भूमिका निभाने की कोशिश करेगा।
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सऊदी अरब ईरान को अपना सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है। चाहे यमन के हूती विद्रोही हों या खाड़ी क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई, दोनों देशों के बीच कई बार तनाव देखने को मिला है। हालांकि, हाल के वर्षों में रिश्तों को सुधारने की कोशिश भी हुई है। ऐसे में अगर युद्ध की स्थिति बनती है, तो सऊदी अरब सीधे तौर पर अमेरिका के साथ खड़ा होगा या नहीं, इस पर संदेह है। संभावना यही है कि वह न्यूट्रल रुख अपनाए।
ओमान को क्षेत्र का सबसे संतुलित और शांतिप्रिय देश माना जाता है। 2015 के ईरान परमाणु समझौते में भी ओमान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। यही वजह है कि अगर अमेरिका-ईरान टकराव होता है, तो ओमान किसी का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद और मध्यस्थता का रास्ता अपनाएगा।
ऐसे में अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो मुस्लिम देशों से एकजुट और खुला समर्थन मिलने की संभावना बेहद कम है। ज्यादातर देश अपने हितों को देखते हुए संतुलन और तटस्थता की नीति पर ही चलेंगे।
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