आंखें हमारे जीवन का सबसे कीमती हिस्सा हैं, लेकिन कई बार हम उनकी सेहत को हल्के में ले लेते हैं। ऐसी ही एक गंभीर आंखों की बीमारी है ग्लूकोमा, जो धीरे-धीरे नजर छीन सकती है। ग्वालियर स्थित रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक एवं निदेशक डॉ. पुरेंद्र भसीन के अनुसार, ग्लूकोमा में आंख के अंदर दबाव बढ़ जाता है, जिससे ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है। ऑप्टिक नर्व आंखों से दिमाग तक देखने की जानकारी पहुंचाती है। अगर समय रहते इलाज न हो, तो यह बीमारी स्थायी अंधेपन का कारण भी बन सकती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इसके लक्षण क्या है और बचाव के लिए क्या करना चाहिए?
क्या है ग्लूकोमा?
ग्लूकोमा आंखों से जुड़ी ऐसी बीमारी है जिसमें आंख के भीतर मौजूद तरल का दबाव बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए दबाव का सीधा असर ऑप्टिक नर्व पर पड़ता है। ऑप्टिक नर्व कमजोर होने लगती है और धीरे-धीरे देखने की क्षमता कम होने लगती है। समस्या यह है कि ग्लूकोमा का असर अचानक नहीं दिखता, बल्कि यह चुपचाप आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचाता रहता है।
क्यों कहते हैं ग्लूकोमा को आंखों का साइलेंट किलर?
ग्लूकोमा को आंखों का साइलेंट किलर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण साफतौर पर नजर नहीं आते। ज्यादातर मामलों में मरीज को तब तक कोई परेशानी महसूस नहीं होती, जब तक बीमारी काफी आगे न बढ़ जाए। शुरुआत में देखने का दायरा धीरे-धीरे कम होता है, लेकिन यह बदलाव इतना धीमा होता है कि व्यक्ति को इसका एहसास नहीं हो पाता। जब तक मरीज डॉक्टर के पास पहुंचता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है।
शुरुआती दौर में क्यों नहीं होती ज्यादा परेशानी?
ग्लूकोमा में सबसे पहले साइड से देखने की क्षमता प्रभावित होती है। सामने या सीधा देखने में शुरुआत में कोई दिक्कत नहीं आती। इसी वजह से लोग इसे मामूली समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। समय के साथ साइड विजन और ज्यादा कम होने लगता है और आखिरकार केंद्र की दृष्टि भी प्रभावित हो सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऑप्टिक नर्व को हुआ नुकसान दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता। इसलिए शुरुआती पहचान और इलाज बेहद जरूरी है।
किसे है ग्लूकोमा का ज्यादा खतरा?
ग्लूकोमा किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा दूसरों की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। खासतौर पर 40 साल की उम्र के बाद ग्लूकोमा होने की संभावना बढ़ने लगती है, जबकि 60 वर्ष से ऊपर यह जोखिम लगभग छह गुना तक बढ़ सकता है। इसके अलावा, जिन लोगों के परिवार में पहले किसी को ग्लूकोमा रहा हो, उन्हें भी विशेष सतर्क रहने की जरूरत होती है। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों से पीड़ित लोग और लंबे समय तक स्टेरॉइड दवाओं का इस्तेमाल करने वाले मरीज भी हाई-रिस्क ग्रुप में आते हैं। ऐसे सभी लोगों के लिए जरूरी है कि वे लक्षण दिखने का इंतजार न करें, बल्कि नियमित रूप से आंखों की जांच करवाते रहें, ताकि ग्लूकोमा का समय रहते पता चल सके और आंखों की रोशनी को बचाया जा सके।
ग्लूकोमा के लक्षण क्या हो सकते हैं?
- साइड से देखने में दिक्कत
- आंखों में भारीपन या दर्द
- धुंधला दिखना
- रोशनी के चारों ओर घेरे नजर आना
- सिरदर्द या आंखों में दबाव महसूस होना
अगर ऐसे कोई भी लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत आंखों के डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
ग्लूकोमा से बचाव कैसे करें?
ग्लूकोमा से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है नियमित आंखों की जांच। डॉक्टर आंखों के दबाव की जांच, ऑप्टिक नर्व का परीक्षण और दृष्टि क्षेत्र (विजन फील्ड) की जांच करके इस बीमारी को शुरुआती चरण में पकड़ सकते हैं। अगर समय रहते ग्लूकोमा का पता चल जाए, तो दवाओं, लेजर या सर्जरी की मदद से इसके बढ़ने की गति को रोका जा सकता है और नजर को बचाया जा सकता है।
निष्कर्ष
ग्लूकोमा एक गंभीर लेकिन चुपचाप बढ़ने वाली बीमारी है। सही समय पर पहचान और इलाज से अंधेपन को रोका जा सकता है। आंखों की सेहत को नजरअंदाज न करें, नियमित जांच करवाएं और किसी भी परेशानी को हल्के में न लें।
डिस्क्लेमर
यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य हेल्थ एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
