शहरों में यातायात ठप होना एक ऐसी परिघटना है जिसके दृश्य रोजाना दिखते हैं। लेकिन गुड़गांव में पिछले हफ्ते जैसा जाम लगा उसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। पर जो हुआ वह एकदम हैरानी का विषय नहीं है। जिस तरह से नगर नियोजन हो रहा है उसमें बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई अहम बातों की उपेक्षा की जाती है। मसलन, पानी की निकासी की। इसलिए मानसून के दिनों में सड़कों पर अक्सर जलभराव हो जाता है और उसके चलते आवाजाही थम जाती है। गुड़गांव में भी जाम लगने की बुनियादी वजह यही थी। पर यह कोई सामान्य जाम नहीं था। यह ऐसा जाम था जो इसमें फंसे लोगों के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं था। शाम को निकले लोग पूरी रात गाड़ी में गुजारने को विवश थे। रात की ड्यूटी वाले लोग दफ्तर पहुंच ही नहीं सके।
स्कूलों की छुट्टियां घोषित करनी पड़ीं। कुछ इलाकों में धारा एक सौ चौवालीस लगानी पड़ी। जाम खुलवाने केलिए हरियाणा सरकार तो हलाकान थी ही, केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। मदद के लिए आपदा कार्रवाई बल को भी बुलाया गया। जाम खुल जाने के बाद लोगों ने और सरकार ने राहत की सांस ली है। पर जो इस जाम में फंसे रहे वे इस कटु अनुभव को शायद ही कभी भूल पाएं। मिलेनियम सिटी कहे जाने वाले गुड़गांव की छवि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दफ्तरों, व्यावसायिक परिसरों, बड़े-बड़े मॉलों, आइटी-हब और आलीशान बहुमंजिला इमारतों के कारण आधुनिक विकास की दौड़ में एक अव्वल शहर की है। पर इस महा-जाम ने उसकी चमक फीकी की है, और यह सोचने को विवश किया है कि जिन शहरों को हम विकास के प्रतीक मानते हैं, कहीं वे खोखली बुनियाद पर तो खड़े नहीं हैं! गुड़गांव के इस जाम ने जुलाई 2005 की मुंबई की याद दिला दी, जब वहां का जन-जीवन एकदम अस्त-व्यस्त हो गया था। पर मुंबई का वैसा हाल दो-तीन दिन की लगातार बारिश के बाद हुआ था। जबकि महज तीन घंटे की बारिश ने गुड़गांव को रुला दिया। यह कोई असामान्य बारिश नहीं थी।
दरअसल, मुसीबत की कछ वजह स्थानीय और तात्कालिक थी। मरम्मत के लिए बंद की गई बादशाहपुर ड्रेन बारिश के पानी का दबाव नहीं झेल सकी और टूट गई। हीरो होंडा चौक पर, जहां यो भी अक्सर जाम लगता रहता है, बन रहे फ्लाइओवर के कारण यातायात को सामान्य बनाने में काफी मुश्किलें आर्इं। इस तरह के और भी कारण गिनाए जा सकते हैं। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे नगर नियोजन में पानी की निकासी के तकाजे को भुला दिया गया है। झीलें और तालाब जल संचय के कुदरती स्थान थे, जहां विभिन्न प्राकृतिक रास्तों से पानी इकट्ठा होता था। पर तमाम तालाबों और झीलों को पाट कर उन पर रिहाइशी कॉलोनियां और व्यावसायिक परिसर बना दिए गए। यह सारे देश में हुआ है। इसलिए कभी मुंबई में जल-भराव से त्राहि-त्राहि की स्थिति बन जाती है तो कभी चेन्नई का नंबर आ जाता है, कभी भोपाल और बंगलुरु का तो कभी गुड़गांव का। ऐसा विकास टिकाऊ नहीं हो सकता, बल्कि एक दिन अर्थव्यवस्था के लिए संकट का सबब बन जा सकता है। लिहाजा, इस अपूर्व जाम को आई-गई बात मान लेने के बजाय यह गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि इस त्रासद घटना के सबक क्या हैं।

