अकसर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जिनमें किसी कैदी को अदालत में पेशी के लिए ले जाते हुए या अस्पताल में इलाज के दौरान पुलिस और संबंधित महकमों की ओर से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे, या फिर लापरवाही बरती गई, जिसका फायदा उठा कर कोई बंदी भाग गया। इसमें कैदियों के अकेले या अपने साथियों के साथ भागने से लेकर उसे छुड़ा कर भगा ले जाने के लिए सुनियोजित रूप से अचानक किया गया हमला भी शामिल है। ऐसी कई घटनाएं होने और इसकी लगातार आशंका के बावजूद कैदियों की निगरानी करने वाली पुलिस टीम को सावधानी बरतना जरूरी नहीं लगता है। मंगलवार को दिल्ली में एक ऐसी ही घटना में अपने मित्रों की मदद से एक कैदी फरार हो गया। पहले भी कई मुकदमों में आरोपी रहे संदीप ढिल्लू को अगर तिहाड़ की मंडोली जेल के उच्च सुरक्षा वाले वार्ड में रखा गया था तो इसका मतलब यही है कि उसे खतरनाक मानते हुए उसकी गतिविधियों पर निगरानी को जरूरी माना गया। जब उसे इलाज के लिए मौलाना आजाद डेंटल कॉलेज में ले जाया गया तो उसके साथ तीन पुलिसकर्मी थे, लेकिन उन्हें चकमा देकर वह आराम से भाग गया। इस बीच अस्पताल परिसर में मौजूद उसके तीन साथियों ने तीनों पुलिसकर्मियों की आंख में मिर्च पाउडर झोंक दिया।
सवाल है कि जेल से इलाज के लिए अस्पताल लाए जाने और सुरक्षा इंतजाम में सिर्फ तीन पुलिसकर्मियों की तैनाती की सूचना फरार अपराधी या उसके साथियों को कैसे मिली! एक खूंखार कैदी को सिर्फ तीन पुलिसकर्मियों के साथ इलाज के लिए क्यों भेजा गया! इसके अलावा, पुलिस के जवानों को किस तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि वे अचानक हमले से उपजी किसी ऐसी स्थिति में अपराधियों का सामना करने और उन्हें पकड़ने के बजाय खुद को लाचार महसूस करने लगते हैं! एक कैदी के फरार होने की इस घटना में जो तथ्य सामने आए, उनके मद्देनजर इसमें पुलिस वालों की मिलीभगत की भी आशंका जताई जा रही है।
कुछ महीने पहले जब मध्यप्रदेश में भोपाल की जेल से आठ कैदियों के भाग जाने और फिर मुठभेड़ में उनके मारे जाने की खबर आई थी, तब केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को जेल सुरक्षा पर दिशा-निर्देश जारी करने की बात कही थी। लेकिन लगता है कैदियों की फरारी की घटना के सुर्खियों में आ जाने और तूल पकड़ने के बाद ऐसे निर्देश और आश्वासन शायद इसलिए जारी किए जाते हैं, ताकि सुरक्षा-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार महकमों और लोगों को कठघरे में खड़ा होने से बचाया जा सके। इसलिए थोड़े दिनों बाद फिर पहले की तरह लापरवाही का आलम दिखता है। जेलों में और पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार के चलते सुरक्षा व्यवस्था किस कदर प्रभावित होती है, यह किसी से छिपा नहीं है। एक तरफ हमारी जेलों में क्षमता से बहुत ज्यादा कैदी भरे होते हैं, क्योंकि मुकदमे बरसों-बरस खिंचते रहते हैं, और इस स्थिति में बहुत-से लोग विचाराधीन कैदी के रूप में, यानी अदालत द्वारा निर्धारित सजा के बगैर, जेल में सड़ने को अभिशप्त रहते हैं। दूसरी तरफ, खूंखार अपराधी जेल से निकल भागते हैं! एक स्थिति हमारी न्याय-व्यवस्था पर टिप्पणी है, तो दूसरी, हमारी सुरक्षा-व्यवस्था पर।

