राजस्थान सरकार को आखिरकार अपराध-कानून में संशोधन का विवादास्पद विधेयक वापस लेना ही पड़ा। यह विधेयक खासकर अपने दो प्रावधानों के कारण तीखी आलोचना का विषय बन गया था और इसके चलते राज्य सरकार की काफी किरकिरी हुई। एक प्रावधान यह था कि किसी भी मौजूदा या सेवानिवृत्त जज और मौजूदा या सेवानिवृत्त अफसर के खिलाफ सरकार की अनुमति के बिना जांच शुरू नहीं हो सकती; अनुमति के लिए कम से कम छह माह तक इंतजार करना पड़ेगा। दूसरा प्रावधान यह था कि जब तक सरकार जांच की अनुमति नहीं दे देती, आरोप या आरोपी की पहचान की बाबत समाचार प्रकाशित या प्रसारित नहीं किया जा सकेगा। राज्य सरकार की दलील थी कि ऐसे प्रावधान इसलिए किए जा रहे हैं ताकि जज और अफसर अपना काम निर्भीक होकर कर सकें। यह दलील निहायत बेतुकी थी। किसी जज के खिलाफ जांच या कार्रवाई के संबंध में प्रक्रियाएं उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय ने तय कर रखी हैं, इसलिए राज्य सरकार को इस बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं थी। जहां तक अफसरों या लोकसेवकों का सवाल है, उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार की अनुमति का प्रावधान पहले से है।

विधेयक का मकसद था कि जब तक सरकार अनुमति न दे, तब तक जांच भी शुरू न हो सके; आरोपी के बारे में खबर भी न बन सके। अगर आपराधिक मामले में पुलिस जांच ही नहीं कर पाती, तो कैसे पता चलता कि मामला मुकदमा चलाने लायक है या नहीं। फिर खबर पर रोक क्यों? इन प्रावधानों से राज्य सरकार ने अपना मिजाज और अपनी मंशा जाहिर कर दी। राजस्थान सरकार पर आरोप लगने लगा कि वह भ्रष्टाचार तथा दूसरे मामलों में भी आरोपी अफसरों को बचाना चाहती है, वरना वह ऐसे प्रावधानों वाला अध्यादेश क्यों जारी करती, और फिर इस तरह का विधेयक क्यों लाती? जहां विपक्ष इस विधेयक के खिलाफ लामबंद था, वहीं पत्रकार भी क्षुब्ध थे। एडीटर्स गिल्ड ने बाकायदा बयान जारी कर विधेयक वापस लेने की मांग की थी। विधेयक से पहले, पिछले साल सितंबर में उपर्युक्त प्रावधानों वाला एक अध्यादेश सरकार जारी कर चुकी थी। विधेयक को उसी अध्यादेश की जगह लेनी थी। लेकिन तेईस अक्तूबर को जब विधेयक विधानसभा में पेश किया गया, तब तक उसका विरोध काफी व्यापक शक्ल अख्तियार कर चुका था। शायद भाजपा के भीतर भी विधेयक को लेकर थोड़ी-बहुत नाराजगी थी। इसलिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कदम पीछे खींचने में ही भलाई समझी और विधेयक को प्रवर समिति को भेज कर एक प्रकार से ठंडे बस्ते में डाल दिया। और अब औपचारिक रूप से उसे वापस भी ले लिया है।

अगर सरकार अब भी विधेयक को लेकर अड़ी रहती, तो उसे फिर वैसे ही तीखे विरोध का सामना करना पड़ता। हाल के उपचुनावों में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद और आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा करना काफी जोखिम-भरा साबित होता। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में इसी तरह के प्रावधानों वाला मानहानि विधेयक आया था, जिसे देश भर में हुए जबर्दस्त विरोध के बाद वापस लेना पड़ा। विडंबना यह है कि राजस्थान में वैसा ही एक अलोकतांत्रिक कानून बनाने की पहल उस पार्टी की सरकार ने की थी, जो पार्टी मानहानि विधेयक के विरोध में आगे रही थी। प्रधानमंत्री कहते हैं कि लोकतंत्र उनकी पार्टी की रगों में है। क्या उनकी पार्टी की राजस्थान सरकार ने इसी का परिचय दिया? लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं होता, यह भी होता है कि मानवाधिकारों का, अभिव्यक्ति के अधिकार समेत नागरिक अधिकारों का कितना खयाल रखा जाता है।