बचपन से ही क्रांतिकारी प्रवृति के डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक रहे। उनका जन्म महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ। उन्होंने बालपन से ही संघर्ष को झेला क्योंकि परिवार की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी। 13 साल की उम्र में ही उनके सिर से मां और पिता का साया उठ गया। उनके पिता बलिराम पंत हेडगेवार और माता रेवती का निधन प्लेग की वजह से हुआ।
शिक्षा
केशव बलिराम हेडगेवार को नील सिटी हाई स्कूल में एक बार ब्रिटिश शासक के आने पर वंदेमातरम का उद्घोष करने पर स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से निकाले जाने के बाद उनकी हाई स्कूल की पढ़ाई यवतमाल में राष्ट्रीय विद्यालय से हुई। इसके बाद 12वीं की पढ़ाई पुणे से पूरी करने के बाद उनको डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए हिंदू महासभा के अध्यक्ष बीएस मुंजे ने 1910 में कोलकाता भेज दिया। राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज से एलएमएस परीक्षा पास करने के बाद 1914 में उन्होंने डॉक्टरी का प्रशिक्षण लिया और 1915 में डॉक्टर बनकर नागपुर लौट आए।
पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव
हेडगेवार जब चिकित्सक की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए तो वहां अनुशीलन समिति से जुड़ गए। 1915 में नागपुर लौटने पर वह कांग्रेस में सक्रिय हो गए और विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बन गए। 1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का देश स्तरीय अधिवेशन हुआ तो केशव राव बलिराम हेडगेवार ने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत किया लेकिन वह प्रस्ताव उस समय पारित नहीं किया गया। हेडगेवार ने 1921 में कांग्रेस के असहयोग आंदोलन में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी और उन्हें एक साल जेल की सजा हुई। हेडेगेवार की लोकप्रियता को इस तरह समझा जा सकता है कि जब वे रिहा हुए उनके स्वागत के लिए एक सभा का आयोजन किया गया। इससे भी बड़ी बात यह कि उस सभा को पंडित मोतीलाल नेहरु और हकीम अजमल खां जैसे दिग्गजों ने संबोधित किया।
संघ की स्थापना
28 सितंबर 1925 में को संघ कार्य की शुरुआत की गई। इसके बाद भी उनका कांग्रेस और क्रांतिकारियों के प्रति रुख सकारात्मक रहा। उन्होंने डॉक्टर बालकृष्ण शिवराम मुंजे, परांजपे और बापू साहिब सोनी के साथ मिलकर एक हिंदू युवक क्लब की स्थापना की, जिसका नाम बाद में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ दिया गया। कांग्रेस के प्रति सकारात्मक रुख के कारण वे दिसंबर 1930 में महात्मा गांधी द्वारा नमक कानून विरोधी आंदोलन छेड़ा गया तो उसमें भी उन्होंने प्रमुख (सरसंघ चालक) की जिम्मेदारी डॉक्टर परापंजे को सौप कर व्यक्तिगत रूप से अपने एक दर्जन सहयोगियों के साथ भगा दिया। जिसमें उन्हें 9 माह की कैद हुई। इसी तरह 1929 में जब लाहौर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास किया गया और 26 जनवरी 1930 को देश भर में तिरंगा फहराने का आह्वान किया तो डॉक्टर केशव राव बलिराम हेडगेवार के निर्देश पर सभी संघ शाखाओं में 30 जनवरी को तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वराज प्राप्ति का संकल्प किया गया। वे 1916 में कांग्रेस अधिवेशन में लखनऊ गए। जब कांग्रेस से मोह भंग हुआ तो संघ की स्थापना नागपुर में की। सावरकर के हिंदुत्व संस्करण में उन्होंने अपना योगदान दिया।
एक अच्छे नेतृत्वकर्ता
हैदराबाद के शासक निजाम ने वहां के हिंदुओं का जीना दूभर कर रखा था। यहां तक कि कोई हिंदू मंदिर नहीं बना सकता था और यज्ञ आदि करने पर भी प्रतिबंध था। 1938 में आर्य समाज ने हैदराबाद के निजाम के जिहादी आदेशों के विरुद्ध आंदोलन करने की ठानी। गांधी ने आर्य समाज को आंदोलन न करने की सलाह दी। वीर सावरकर ने कहा कि अगर आर्य समाज आंदोलन छेड़ता है तो हिंदू महासभा उसे समर्थन देगी। उस समय जो आंदोलन चला, लगभग 25,000 सत्याग्रही देश के विभिन्न भागों से आए। निजाम की पुलिस और वहां के रजाकारों द्वारा उन सत्याग्रहियों की जेल में बेदर्दी से पिटाई की जाती थी। सत्याग्रहियों की रजाकारों की पिटाई से मृत्यु तक हो गई। इन सत्याग्रहियों में लगभग 12,000 हिंदू महासभाई थे। वीर सावरकर ने स्वयं पूना जा कर कई जत्थे हैदराबाद भिजवाए। पूना से सबसे बड़ा जत्था नाथूराम गोडसे के नेतृत्व में हैदराबाद भिजवाया गया, जिसमें हिंदू महासभा कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त संघ के भी कई स्वयंसेवक थे। इस तरह 1940 तक, जब तक डॉक्टर हेडगेवार जीवित थे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिंदू महासभा का युवा संगठन ही माना जाता था।
निधन
हेडगेवार 1925 से 1940 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। नागपुर में 21 जून 1940 में उनका निधन हुआ। उनकी समाधि रेशम बाग नागपुर में स्थित है।

