पिछले लोकसभा चुनाव के समय से ही चल रहा है पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सियासी टकराव। कोई अपने ऊपर नहीं लेता दोष। दोनों ही एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहे हैं। विधानसभा चुनाव तक तो फिर भी गनीमत दिखी लेकिन पंचायत चुनाव में यह टकराव हिंसक हो गया था। अदालती जंग भी लड़ी गई और सूबे की सरकार पर दादागीरी करने व विरोधियों को नामजदगी के पर्चे दाखिल नहीं करने देने तक के आरोप लगे। कहा गया कि निर्विरोध अपनों को विजयी घोषित कराने के फेर में उलझी थी तब ममता सरकार। पंचायत चुनाव में पचास से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। लेकिन ममता बनर्जी ने सियासी हिंसा का अंजाम इन मौतों को कभी नहीं माना। उलटे भाजपा की अंदरूनी कलह और उसी के लोगों की आपसी दुश्मनी का अंजाम बता दिया इन हत्याओं को। लोकसभा चुनाव में दीदी को गहरा झटका दे दिया भाजपा ने। एक तरफ वे चुनाव से पहले राजग के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक मोर्चा बनाने का राग छेड़ रही थीं तो दूसरी तरफ कोलकाता पहुंचते ही सुर बदल जाते थे। यही कि न वाममोर्चे से हाथ मिलाएंगी और न कांग्रेस से। यही अहंकार भाजपा की बढ़त का कारण बन गया। लोकसभा में मोदी और शाह की सभाओं में जुटी भीड़ को देखकर भी नहीं हुआ ममता को बदलते सियासी माहौल का अहसास। भाजपा के विरोध में उन्होंने जो भी कदम उठाया, उससे भाजपा को लोगों की सहानुभूति ही मिली। कभी अमित शाह को यात्रा नहीं निकालने दी तो कभी योगी आदित्यनाथ का विमान नहीं उतरने दिया।
चुनावी हिंसा में भाजपा के अनेक कार्यकर्ता पांच साल में बेमौत मर गए पर ममता गलतफहमी में ही अकड़ती रहीं। बहरहाल अमित शाह ने जब 22 सीट जीतने का लक्ष्य रखा था तो हर कोई हैरान था। पिछली बार तो दो ही सीटें मिली थीं भाजपा को। ममता ने तो चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा का खाता तक नहीं खुलने देने का दावा कर डाला था। प्रधानमंत्री की खिल्ली उड़ाते हुए शून्य को परिभाषित करने के लिए उंगली को गोल घुमाते हुए बोला था कि पश्चिम बंगाल में तो उन्हें रोसोगुल्ला ही हाथ आएगा। मोदी ने जब उनके रसगुल्ले को भी स्वीकार करने की बात कही तो ममता और बौखला गई कि वे रसगुल्ले में मिट्टी मिला देंगी।
बहरहाल बात मोदी के नए मंत्रिमंडल की शपथ की चली तो ममता ने उदारता दिखानी चाही और कह दिया कि वे शपथ ग्रहण में दिल्ली जाएंगी। पर जैसे ही खबर मिली कि सियासी हिंसा में मारे गए भाजपा के 53 कार्यकर्ताओं के परिवारजनों को भी आया है मोदी का बुलावा तो ममता बिफर उठीं। दिल्ली जाकर शपथ समारोह में शिरकत का इरादा तो छोड़ा ही भाजपा पर फिर सियासी हिंसा की झूठी खबर फैलाने का आरोप मढ़ दिया। ममता को यह स्वीकार नहीं कि भाजपा कार्यकर्ताओं की मौत का सियासी लाभ उठाए। रही भाजपा की बात तो उसने साफ कह दिया कि मकसद सूबे के पार्टी कार्यकर्ताओं को यह अहसास कराना है कि पूरी पार्टी उनके साथ है। जहां तक दीदी का सवाल है वे तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भाजपाई हिंसा में हुई मौत के विरोध में धरने पर जा बैठीं। भाजपा ने अब ममता की पार्टी में सेंध का जो सिलसिला शुरू किया है उससे तो साफ है कि दोनों पार्टियों में टकराव लोकसभा चुनाव निपटने के बाद भी थमने से रहा।
