डोनाल्ड ट्रंप की भारत की यात्रा से पहले अमेरिका और तालिबान ने एक बयान में ऐलान किया है कि दोनों पक्ष 29 फरवरी को शांति समझौते पर दस्तखत करेंगे। भारत का अफगानिस्तान में काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है और इस ऐलान को लेकर भारतीय राजनयिक संतुष्ट नहीं बताए जा रहे। इस मुद्दे को ट्रंप के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तरीय वार्ता में उठाए जाने की तैयारी है। अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर बातचीत होगी, जिसमें भारत की दखल जरूरी माना जा रही है।
अमेरिका और तालिबान के बीच संघर्ष पर विराम के साथ ही अफगानिस्तान में शांति की उम्मीद की जा रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपिओ ने ट्वीट कर कहा है कि लंबे समय के बाद तालिबान के साथ बात बन गई है। इससे अफगानिस्तान में हिंसा रुक सकेगी। अफगानिस्तान में हिंसा रोकने के लिए एक समझौते पर अमेरिका 29 फरवरी को हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रहा है।
लेकिन अफगानिस्तान में बात सिर्फ शांति की नहीं है। पाकिस्तान का अपना कोण है। साथ ही, भारत के कारोबारी हितों के सवाल भी हैं। अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते से भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। समझौते के बाद भू- राजनैतिक रूप से अहम अफगानिस्तान में तालिबान के कदम पसारने का रास्ता खुल जाएगा।
तालिबान के पाकिस्तान से करीबी संबंध हैं। ऐसे में अफगानिस्तान की जो नवनिर्वाचित सरकार भारत समर्थक मानी जाती है, उसके आस्तित्व को खतरा होगा और भारत की कई विकास परियोजनाएं प्रभावित होंगी। इसके अलावा पश्चिम एशिया में पांव पसारने की तैयारी में लगी राजग सरकार की रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है।
अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते को दो प्रक्रिया के तहत लागू किया जाएगा। इसमें अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से चरणबद्ध वापसी और अफगानिस्तान के विभिन्न गुटों के बीच संवाद की बात शामिल है। अफगानिस्तान की राष्ट्र्नीय सुरक्षा समिति के प्रवक्ता जावेद फैसल ने कहा है कि अफगान सुरक्षा बलों और अमेरिका व तालिबान के बीच हिंसा में कमी जल्द ही हो जाएगी।
लेकिन तालिबान-अमेरिका शांति वार्ता को पाकिस्तान के लिए फायदे का सौदा माना जा रहा है। अमेरिका और तालिबान के बीच पाकिस्तानी सरकार और उसकी खुफिया एजंसी आइएसआइ ने बिचौलिए का काम किया है।
भारतीय राजनयिकों का मानना है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों के वापस जाते ही पाकिस्तान तालिबान की मदद से कश्मीर में आतंकी घटनाओं को बढ़ा सकता है।
दरअसल, तालिबान को अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर पाकिस्तान ही लेकर आया, क्योंकि वह अपने पड़ोस से अमेरिकी फौजों की जल्द वापसी चाहता है।
कतर की राजधानी दोहा में हो रही अमेरिका-तालिबान वार्ता में शामिल होने के लिए पाकिस्तान ने कुछ महीने पहले ही तालिबान के उप संस्थापक मुल्ला बारादर को जेल से रिहा किया था। यह भी माना जा रहा है कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान की जड़ें मजबूत होती हैं तो वहां की मौजूदा सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तानी फौज, तालिबान को सैन्य साजो-सामान मुहैया करा सकती है। अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार के साथ पाकिस्तान के संबंध सही नहीं है।
माना जा रहा है कि अमेरिकी फौजों के जाते ही तालिबान के लोग अफगान सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर सकते हैं। इससे इस देश में गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो जाएगा। तालिबान को पाकिस्तान से परोक्ष रूप से मिल रहा सैन्य समर्थन अफगान सरकार के लिए चिंता का विषय है। भारत ने अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप के देशों से व्यापार और संबंधों को मजबूती देने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में भारी निवेश किया है। अफगानिस्तान में तालिबान के प्रभावी होने की स्थिति में भारत की यह परियोजना खतरे में पड़ सकती है।

