सोने के आभूषणों की चाहत हर किसी को होती है। मगर इसकी कीमतों में आए दिन जिस तरह का उछाल देखने को मिल रहा है, उससे समाज का एक बड़ा वर्ग सोने की खरीदारी करने की हैसियत से बाहर होता जा रहा है। दिल्ली के सर्राफा बाजार में बुधवार को सोना बारह सौ रुपए की छलांग लगा कर दो सप्ताह के उच्चतम स्तर एक लाख तीस हजार रुपए प्रति दस ग्राम के पार चला गया। मगर सवाल है कि सोने के दाम लगातार नई ऊंचाइयों को क्यों छू रहे हैं?
असल में संस्थागत निवेशकों, बड़े आभूषण कारोबारियों, खुदरा विक्रेताओं और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की जबर्दस्त खरीदारी इसका एक बड़ा कारण है। इससे मांग बढ़ रही है और आपूर्ति कम होने से दाम आसमान छू रहे हैं। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव, बैंकों की जमा ब्याज दरों में कमी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण भी सोने की मांग बढ़ रही है। यह सच है कि कुछ लोग सोने की खरीदारी को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं, लेकिन इसके बढ़ते दामों का बाजार और अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
यह एक नया परिदृश्य है, जिसमें सोने को अब सुरक्षित और स्थिर निवेश के रूप में देखा जा रहा है। जबकि वित्तीय निवेश तंत्र और मुद्रा में लोगों का भरोसा घट रहा है। दुनियाभर में अस्थिरता का असर भी सोने की कीमतों पर पड़ा है। केंद्रीय बैंक सोने की ज्यादा खरीदारी कर रहे हैं। उनकी अपनी चिंताएं हैं। डालर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है।
तमाम आशंकाओं और अनिश्चितता की पृष्ठभूमि में अगर सोने की खरीदारी बढ़ रही है, तो इसके पीछे की चिंता को समझा जा सकता है। लोगों को लगता है कि अन्य निवेश के मुकाबले सोने में फायदा है। इसके दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार से तय होते हैं, लिहाजा इसमें किसी का सीधा हस्तक्षेप संभव नहीं है। मगर वैकल्पिक बंदोबस्त किए जा सकते हैं। जब-जब सोने के दाम बढ़ते हैं, महंगाई भी बढ़ती जाती है। चिंता की बात है कि सरकार इसे गंभीरता से लेती नहीं दिख रही है, जबकि सोने में तेजी महंगाई बढ़ने का ही संकेत है।
