निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के संदर्भ में एक सबसे अहम अपेक्षा यह रही है कि इसे पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। कई तरह के विवादों के बीच विपक्षी दलों की ओर से उठाई गई एक प्रमुख मांग भी यही है। इस मसले पर निर्वाचन आयोग की यही दलील रही है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य अपात्र लोगों को बाहर करना है। इसमें स्थान बदलने वाले लोगों से लेकर वैसे लोग भी शामिल होंगे, जिनकी मौत हो चुकी है।
इस घोषित मकसद से किसी को आपत्ति नहीं होगी, लेकिन अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची से जितनी बड़ी तादाद में लोगों के नाम बाहर होने की खबरें आईं हैं, उसे लेकर कई सवाल उठे हैं। इसकी जड़ में मुख्य कारण इस समूची प्रक्रिया में अपेक्षित पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं किया जाना हो सकता है और इसीलिए आम नागरिकों के बीच तमाम आशंकाएं उभरीं। अगर एसआइआर की प्रक्रिया को शुरू से आखिर तक पूरी तरह पारदर्शी बनाने की व्यवस्था की जाती, तो संभवत: अनावश्यक विवाद नहीं खड़े होते।
अब सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के संदर्भ में यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस समूची कवायद में तार्किक विसंगतियों की श्रेणी में रखे गए मतदाताओं का सत्यापन पूरी तरह पारदर्शी ढंग से हो और इससे लोगों को अनावश्यक तनाव तथा असुविधा न हो। गौरतलब है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान ऐसी तमाम शिकायतें सामने आईं कि मनमाने तरीके से नागरिकों के नाम बाहर किए गए। कई जगहों पर लोगों को समय पर इसकी जानकारी भी नहीं हुई और उनका नाम मतदाता सूची से हट गया। जाहिर है, निर्वाचन आयोग की ओर से यह प्रक्रिया जिस स्तर पर चलाई गई, उसमें मतदाता सूची से बाहर होने वाले लोगों को सूचित करने और उन्हें अवसर देने को लेकर सवाल उठे।
पश्चिम बंगाल में भी चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान नाम, उपनाम, आयु में गड़बड़ी आदि की वजह से करीब एक करोड़ पच्चीस लाख मतदाताओं को तार्किक विसंगति नोटिस जारी किया था। इस संदर्भ में शीर्ष अदालत ने आयोग को निर्देश दिया कि वह किसी भी तरह की गड़बड़ी वाली मतदाता सूची को ग्राम पंचायत भवन, प्रखंड कार्यालय और वार्ड कार्यालय में सार्वजनिक तौर पर लगाए, ताकि लोगों को पता चल सके।
सवाल है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को पूरी तरह पारदर्शी बनाने का जो काम निर्वाचन आयोग को अपनी प्रक्रिया में प्राथमिक स्तर पर खुद ही अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए था, उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देने की जरूरत क्यों पड़ रही है। तार्किक विसंगति के दायरे में आए सभी नामों को सार्वजनिक करने के अलावा मतदाता सूची में नाम होने के लिए जरूरी दस्तावेजों में आधार कार्ड शामिल करने को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था।
सच यह है कि बिहार सहित देश के जिन राज्यों में मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया संचालित की गई, वहां सबसे अहम सवाल पारदर्शिता को लेकर ही उठे। इससे किसी को भी असहमति नहीं होगी कि चुनाव प्रक्रिया में कोई भी अवैध रूप से हिस्सा न ले और सिर्फ पात्र लोगों को ही मतदान का अधिकार मिले। मगर यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सभी पात्र लोगों को खुद को सही साबित करने के लिए जरूरी अवसर और सुविधा मिले, ताकि वह मतदान के लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न हो।
