उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनने जा रहा है, जहां समान नागरिक संहिता लागू होगी। इसका मसविदा तैयार करने के लिए गठित समिति ने मुख्यमंत्री को अपनी रपट सौंप दी है। प्रस्तावित कानून में आदिवासी समूहों को छोड़ कर सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार आदि के समान नियम होंगे। इस मसविदे में समानता द्वारा समरसता लाने का दावा किया गया है। समान नागरिक संहिता लागू करने का मुद्दा आजादी के बाद से ही उठता रहा है, मगर तमाम विचार-विमर्शों के बाद भी इसका कोई अंतिम स्वरूप तय नहीं हो सका।
बीजेपी ने विधानसभा चुनाव के बाद लागू करने का किया था वादा
इसलिए सर्वोच्च अदालत ने भी इसे एक तरह से निष्क्रिय विषय मान लिया था। मगर चूंकि भाजपा के घोषणापत्र में सदा से राममंदिर, अनुच्छेद तीन सौ सत्तर और समान नागरिक संहिता लागू करने का वचन रेखांकित किया जाता रहा है, वह इसे लेकर मंथन करती रही है। उत्तराखंड में भी विधानसभा चुनावों में इसे लागू करने का वादा किया गया था। सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल की पहली बैठक में ही इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में पांच सदस्यों की मसविदा समिति गठित कर दी गई थी।
समिति ने बहुविवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि पर राय कायम की
समिति ने विभिन्न वर्गों से बातचीत और जनमत सर्वेक्षण के आधार पर बहुविवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि से जुड़े मामलों पर अपनी राय कायम की है। हालांकि तीन तलाक को कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में केंद्र सरकार पहले ही डाल चुकी है, इसलिए इसे लेकर बहुत विवाद नहीं है। मुसलिम पर्सनल कानून के तहत बहुविवाह और उत्तराधिकार को लेकर मुसलिम समाज में भी बहुत जिद नहीं नजर नहीं आती। मुसलिम समाज का एक बड़ा धड़ा तो उत्तराधिकार संबंधी उन्हीं नियमों का पालन करता है, जिन्हें हिंदू मानते आए हैं।
मुस्लिम समाज में अब बहुविवाह के पक्ष में दबाव कम देखा जा रहा है
फिर, मुसलिम समाज अब पढ़-लिख कर विवाह और तलाक संबंधी पुरानी मान्यताओं से काफी बाहर निकल चुका है। वह खुद बहुविवाह के पक्ष में कम देखा जाने लगा है। इसलिए उत्तराखंड सरकार को इन मामलों में शायद ही कोई चुनौती मिले। उसने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर किसी प्रकार का कानून बनाने से परहेज किया और उसका निर्णय केंद्र के पाले में डाल दिया है।
मगर समान नागरिक संहिता लागू करना इतना आसान मामला शायद ही हो पाए, क्योंकि उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर हिंदू समाज के भीतर ही अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग नियम और परंपराएं हैं। हालांकि पिता की संपत्ति में पुत्री के समान अधिकार का कानून बहुत पहले बन गया था, उससे उत्तराधिकार का मसला भी काफी हद तक सुलझ गया था, मगर अनेक समुदायों में इसका निर्धारण उनमें प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार होता है। खासकर दत्तक अधिनियम को लेकर हिंदू और मुसलिम समुदाय में अंतर है।
इसी तरह अनेक समुदायों में इसे लेकर भेद हैं। पूर्वोत्तर के इसाई बहुल राज्यों में व्यक्तिगत कानून भिन्न हैं। अलग-अलग राज्यों में वहां की आबादी के हिसाब से व्यक्तिगत कानून लागू हैं। हालांकि माना जा रहा है कि अगर उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता सफलतापूर्वक लागू हो गई, तो वह दूसरे राज्यों के लिए नजीर बन सकती है। मगर चूंकि यह समवर्ती सूची का मामला है, केंद्र सरकार के सामने व्यक्तिगत कानूनों में समानता लाकर समाज में समरसता लाने की चुनौतियां बनी रहेंगी।
