UN Report on Ground Water: दुनिया में बढ़ता जल संकट चिंता का विषय बना हुआ है। अगला विश्व युद्ध पानी के लिए लड़े जाने की भविष्यवाणियां तक की जा चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान के शोधकर्ताओं की हाल में आई एक रपट इन चिंताओं को और गंभीर रूप दे रही है। इसमें कहा गया है कि पिछले कई दशकों के दौरान जल के अत्यधिक दोहन, सिमटते भूजल स्रोतों, भूमि क्षरण, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से उपजी बाधाओं की वजह से दुनिया अब जल संकट की अवस्था से आगे बढ़कर ‘वैश्विक जल दिवालियापन’ की स्थिति में कदम रख चुकी है।

जब कोई इंसान दिवालिया होता है, तो उसके पास पैसा नहीं बचता, घर तक गिरवी हो जाता है और विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। बड़ा सवाल यह है कि अगर दुनिया पानी के लिहाज से दिवालिया हो गई, तो क्या होगा? रपट में शोधकर्ताओं ने जो कुछ कहा है, उसका मतलब यह नहीं कि दुनिया से पानी अचानक खत्म हो जाएगा, बल्कि जिस ढंग से जल का अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण बढ़ रहा है, उससे जल व्यवस्था की रीढ़ टूटनी शुरू हो गई है।

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समूचे विश्व में बहुत पहले से जल संकट की चर्चा होती रही है, मगर इसे एक ऐसे झटके की तरह देखा जाता रहा है, जिससे समय के साथ उबरा जा सकता है। अगर जल संकट के बारे मेंं चेतावनी दी जाती रही है, तो यह भरोसा भी दिलाया जाता रहा है कि फिर से अच्छी बरसात होगी, जल का स्तर सुधर जाएगा और हालात पुन: सामान्य हो जाएंगे।

मगर नई रपट ने इस भरोसे पर सवालिया निशान लगा दिया है। रपट में साफ कहा गया है कि विश्व की जल आपूर्ति प्रणाली कई जगहों पर पतन के दौर में पहुंच चुकी है। अनेक क्षेत्रों में पानी की कमी अब स्थायी स्वरूप लेती जा रही है। यह स्थिति केवल पानी की कमी की नहीं, बल्कि व्यवस्था के टूटने की ओर संकेत करती है। ऐसे में अब हमें पानी के बारे में अपने सोचने का ढंग बदलना होगा।

अब तक जल संकट को एक अस्थायी समस्या माना जाता रहा है। अकाल पड़े, परेशानियां आर्इं, मगर कुछ साल बाद हालात सुधर गए। किसी साल वर्षा कम हुई, लेकिन अगले मानसून में भरपाई हो गई। जब ऐसा चल रहा था, तो नीतियों का निर्धारण भी इसी अनुरूप होता रहा। कभी जल की बूंद-बूंद को सहेजने वाले समाज ने भी लापरवाही बरतना शुरू कर दिया। कई जगहों पर जलस्रोत इतने कमजोर हो चुके हैं कि उन्हें पहले जैसी स्थिति में लौटने में दशकों लग सकते हैं और कई मामलों में शायद लौटना संभव ही न हो पाए।\

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हम दिवालियापन को व्यक्ति के आर्थिक रूप से कंगाल होने के संदर्भ में ही समझते आए हैं। जब कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से दिवालिया होता है, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि दुनिया से पैसा खत्म हो गया है। पैसा रहता है लेकिन उस व्यक्ति की आमदनी, खर्च और कर्ज के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है। इसी तरह दुनिया में पानी मौजूद है, लेकिन उसकी उपलब्धता, उसके उपयोग और उसके पुनर्भरण के बीच संतुलन तेजी से टूट रहा है। हम भू-गर्भ से जितना पानी निकाल रहे हैं, उतना पुनर्भरण नहीं कर रहे हैं। यानी जल खाता खाली हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र के शोधकर्ताओं ने रपट में जो कुछ कहा है, उसके अनुसार इस असंतुलन की जड़ें दशकों पुरानी हैं। भूजल के अंधाधुंध दोहन, नदियों को गंदे नालों में बदल दिए जाने, वनों की कटाई, मिट्टी के क्षरण और जलवायु परिवर्तन ने मिलकर पानी की प्राकृतिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया है। जब पानी प्रदूषित हो जाता है, तो वह मौजूद होते हुए भी उपयोग के लायक नहीं रहता। जब भूजल जरूरत से ज्यादा निकाला जाता है, तो वह वापस भरने से पहले ही खत्म हो जाता है।

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धीरे-धीरे यह स्थिति एक ऐसी सीमा पर पहुंच जाती है, जहां से लौटना बेहद मुश्किल हो जाता है। यह बात भी सच है कि इस संकट का असर सब पर बराबर नहीं पड़ता। जिस प्रकार आर्थिक दिवालियापन में सबसे पहले गरीब तबके टूटते हैं, वैसे ही जल संकट और जल दिवालियापन का सबसे बड़ा बोझ भी कमजोर वर्गों पर पड़ना स्वाभाविक है। छोटे किसानों, आदिवासियों, शहरी गरीब बस्तियों, महिलाओं और युवाओं के जीवन पर सबसे पहले इसका प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत जिन संपन्न एवं शक्तिशाली वर्गों ने सबसे ज्यादा पानी का दोहन किया होता है, उसके लाभ तो अक्सर उन्हीं तक सीमित रहते हैं, लेकिन इसके दुष्परिणाम दूसरों को भुगतने पड़ते हैं।

भारत के संदर्भ में देखें, तो संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी और भी गहरी चिंता पैदा करने वाली है। दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हमारे देश में है, पर उसके हिस्से में उपलब्ध मीठा पानी सीमित है। इसके बावजूद भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जो सबसे ज्यादा भूजल दोहन कर रहे हैं। देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कुएं सूख रहे हैं, हैंडपंप में पानी नहीं आ रहा और हर साल गहरे नलकूप खोदे जा रहे हैं।

हमारी नदियों की हालत भी सबके सामने है। कई नदियां मृत कही जाने लगी हैं, तो कई अब वर्षाकाल तक सीमित हो गई हैं। शहरों में तालाब और झीलें या तो पाट दी गई हैं या गंदे पानी का भंडार बन चुकी हैं। वर्षा जल व्यर्थ बह जाता है, उसे सहेजने के उपाय नहीं हो रहे। तमाम मुश्किलों के बावजूद यह तय है कि हमारे यहां पानी मौजूद है, मगर हम उसका प्रबंधन नहीं कर पा रहे हैं। जाहिर है, भारत में भी जल संकट प्राकृतिक से अधिक नीतिगत है।

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ऐसे उद्योगों की स्थापना पर चिंता व्यक्त की जा रही है, जिनमें जल खपत अत्यधिक होती है। खेती में ज्यादा सिंचाई की जरूरत वाली फसलों को बढ़ावा दिया जाना भी एक बड़ा कारण है। सस्ती या मुफ्त बिजली देने के निर्णयों ने भूजल दोहन को और बढ़ा दिया है। औद्योगिक और शहरी प्रदूषण ने उपलब्ध जल को अनुपयोगी बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। अगर हम जल संकट से पार पाना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले यह मानना होगा कि पानी असीमित नहीं है।

भूजल को निजी संपत्ति मानने की सोच में बदलाव लाना होगा। भूगर्भ में मौजूद पानी सामूहिक धरोहर है और उसकी रक्षा करना भी सामूहिक जिम्मेदारी है। जल संकट और खेती के बीच गहरा संबंध है। हमें खेती में फसलों के चयन को पानी की उपलब्धता से जोड़ना होगा। शहरों और गांवों में जल की बचत को औपचारिकता भर से ऊपर उठकर और जरूरत बनाकर काम करना होगा।

गंदे पानी को बहाने की जगह उसे साफ करके पुन: उपयोग में लाने के काम को बढ़ावा देना होगा। मगर बड़ा सवाल यह है कि यह सब करेगा कौन? केवल सरकारों पर जिम्मेदारी डाल कर इस संकट से नहीं उबरा जा सकता। इसके लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे, क्योंकि जल है तो कल है। जनसत्ता संपादकीय: लाचार व्यवस्था या संवेदनहीन प्रशासन, ग्रेटर नोएडा में युवराज मेहता की मौत का गुनाहगार कौन?