पानी का संकट अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह देश के सामाजिक, आर्थिक, कृषि, स्वास्थ्य और राजनीतिक भविष्य से जुड़ा एक गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है। भारत के अनेक शहर और गांव भूजल के लगातार गिरते स्तर, सूखती नदियों, खत्म होते तालाबों, प्रदूषित जल स्रोतों और अनियोजित शहरीकरण की मार झेल रहे हैं। कहीं लोग पीने के पानी के लिए कई किलोमीटर दूर तक जाने को मजबूर हैं, तो कहीं खेती, पशुपालन और रोजमर्रा की जिंदगी पर जल संकट का गहरा असर दिखाई दे रहा है। बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, बेतहाशा दोहन और जल संरक्षण की उपेक्षा ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है।
देश के कई हिस्सों में हर साल गर्मियों के दौरान पानी को लेकर संघर्ष, पलायन, टैंकर राजनीति और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आती हैं। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक जल संकट अब जीवन की गुणवत्ता, आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल प्रबंधन, संरक्षण और संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग पर गंभीरता से काम नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है।
‘वाटर क्राइसिस’ के जरिए जनसत्ता पानी से जुड़े हर महत्वपूर्ण पहलू पर लगातार नजर रख रहा है। इस विशेष टैग के अंतर्गत जल संकट की जमीनी रिपोर्टें, सूखती नदियों और जलाशयों की स्थिति, भूजल दोहन, सरकारी योजनाओं की वास्तविकता, जल नीति, पर्यावरणीय चुनौतियां, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, ग्रामीण और शहरी इलाकों की समस्याएं, विशेषज्ञों की राय, शोध आधारित विश्लेषण और संभावित समाधान से जुड़ी खबरें और विशेष लेख प्रकाशित किए जा रहे हैं।
जनसत्ता की कोशिश है कि पानी जैसे बुनियादी और भविष्य निर्धारक मुद्दे को केवल मौसमी खबर तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे समाज, नीति और जनचेतना के केंद्र में लाया जाए, ताकि जल संकट को समझने और उससे निपटने की दिशा में गंभीर संवाद आगे बढ़ सके।