पिछले कुछ वर्षों में देश में कानून का दुरुपयोग एक गंभीर चिंता का विषय बनकर उभरा है, जिसने कानूनी पेशेवरों, नीति निर्माताओं और आम जनता का ध्यान आकर्षित किया है। कानून समाज में व्यवस्था बनाए रखने, अधिकारों की रक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग न केवल अदालतों के कीमती समय को जाया करता है, बल्कि कई बार अन्यायपूर्ण परिणाम भी दे सकता है।

इससे न्याय के प्रति जनता के विश्वास को ठेस पहुंचती है और यह कानून के शासन को कमजोर कर सकता है। ऐसे मामलों से अदालतों पर मुकदमों का अनावश्यक बोझ पड़ता है, जिससे न्यायिक प्रणाली में बाधाएं उत्पन्न होती हैं। कुछ लोगों की ओर से अपने निहित स्वार्थों के लिए न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग की इस बढ़ती प्रवृत्ति की सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को कड़ी निंदा की। साथ ही कहा कि आपराधिक कानून व्यक्तिगत दुश्मनी निपटाने के लिए प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का जरिया नहीं बन सकता और सभी अदालतों को ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सतर्क रहना होगा।

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किसी कानून का दुरुपयोग तब होता है, जब उसके प्रावधानों की व्यापकता और लचीलेपन का अनुचित फायदा उठाकर उसे अपना निजी हित साधने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है। इसके कई रूप हो सकते हैं, जिनमें झूठे आरोप, व्यर्थ की मुकदमेबाजी और कानूनी खामियों का लाभ उठाने का प्रयास भी शामिल है।

इस तरह के मामलों की बढ़ती संख्या जहां वास्तविक विवादों से जुड़े मुकदमों के फैसले में देरी का कारण बनती है, वहीं इससे न्यायिक संसाधनों की बर्बादी भी होती है और न्यायिक प्रणाली की विश्वासनीयता कमजोर होती है।

कई बार कानून में अस्पष्टता के कारण भी उसके दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में देश के नीति निर्माताओं का दायित्व है कि वे सभी पहलुओं पर व्यापक चर्चा और गहन मंथन के बाद कानून का अंतिम प्रारूप तैयार कर उसे लागू करें, ताकि उसमें ऐसी कोई खामी न रहे, जिसका आगे चलकर दुरुपयोग किया जा सके।

समाज में न्याय की भावना और कानून के शासन के प्रति सम्मान को बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसमें दोराय नहीं है कि जब कानून का दुरुपयोग होता है, तो न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कम हो जाता है। लोग कानूनी प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रभावशीलता को लेकर सशंकित हो जाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस चिंता के साथ खुद को जोड़ते हुए गुवाहाटी के एक व्यवसायी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को खारिज कर दिया और कहा कि यह कानून के दुरुपयोग से प्रेरित है। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों और अप्रत्यक्ष उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आपराधिक न्याय तंत्र का दुरुपयोग कर रहे हैं।

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ऐसे में अदालतों को इस तरह की प्रवृत्ति के संबंध में सजग रहना होगा और यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि समाज के ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले आपराधिक सोच से जुड़े प्रयासों को शुरू में ही रोक दिया जाए।

इस बात पर गौर करना भी जरूरी है कि कानून के दुरुपयोग पर पूरी तरह अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी प्रावधानों के उचित उपयोग के बारे में जन-जागरूकता बढ़ाने तथा शैक्षिक एवं कानूनी साक्षरता कार्यक्रम इस संबंध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ ही कानूनों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए और अगर जरूरी हो तो उनमें संशोधन किया जाना चाहिए।