आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में रखी जा रही दलीलों से अभी कोई नतीजा भले नहीं निकला हो, लेकिन अदालत ने इस समस्या का ठोस हल निकालने का साफ संदेश दिया है। इसके बरक्स कुछ लोगों को पशुओं के प्रति संवेदनहीनता दर्शाने और कानूनों को ताक पर रखने में हिचक नहीं हो रही है, तो यह मानवीय संवेदना और समझ पर एक सवालिया निशान है।
अगर आवारा कुत्तों की वजह से कोई समस्या पैदा हो रही है, तो उससे बचाव के लिए उचित उपाय निकालने के लिए सरकार से मांग करने और अपने स्तर पर भी सावधानी बरतने की जरूरत है। इसके बजाय अगर कुछ लोगों को कुत्तों को मार डालने जैसे क्रूर रास्ते अपनाना सही लग रहा है, तो यह एक बेहद अफसोसनाक स्थिति है।
गौरतलब है कि तेलंगाना के याचाराम गांव में बुधवार को कुछ लोगों ने कम से कम सौ कुत्तों को कथित तौर पर जहर देकर मार डाला। पुलिस के मुताबिक, ताजा घटना इस महीने तेलंगाना के कई जिलों में अब तक लगभग पांच सौ आवारा कुत्तों को मार डालने के बाद सामने आई है।
यह समझना मुश्किल है कि आवारा कुत्तों के टीकाकरण, बंध्याकरण और उन्हें अनुकूल पर्यावास मुहैया कराने के लिए सरकार से जरूरी कदम उठाने की मांग करने के बजाय लोगों को मानवीय संवेदना के न्यूनतम तकाजों को भी ताक पर रखना क्यों जरूरी लग रहा है।
ऐसे लोगों को संभवत: पशु क्रूरता निवारण से जुड़े कानून की भी कोई फिक्र नहीं है, जो जानवरों को अनावश्यक दर्द पहुंचाने और पीड़ा देने से रोकता है और इसका उल्लंघन करने वालों के लिए दंड का प्रावधान करता है।
विडंबना यह है कि आवारा कुत्तों के काटने या इससे जुड़ी अन्य समस्याओं पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद सरकारें रिहायशी इलाकों से उन्हें हटाने या इस समस्या का हल निकालने को लेकर ज्यादा संवेदनशील नहीं दिखतीं।
आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ने और उनके आक्रामक होते जाने पर पहले ही उपाय कर लिए जाते, तो यह समस्या आज इतनी गंभीर नहीं होती, जितनी दिख रही है। कुत्तों के काटने से उपजे जोखिम से इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि मनुष्य अपनी बुनियादी संवेदनाओं को भी छोड़ दे।
