बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद अब अन्य राज्यों में भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। मगर इन सवालों में अब बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) की व्यस्तता और सीमा का मसला भी जुड़ गया है। चुनाव आयोग की ओर से इन अधिकारियों पर जरूरत से ज्यादा दबाव बनाने के आरोप लग रहे हैं। कई राज्यों में बीएलओ के खिलाफ मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जिसका विरोध भी हो रहा है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग की यह कवायद मतदाता सूची में सुधार नहीं, बल्कि अत्याचार का जरिया बन गया है।

काम के दबाव के कारण संबंधित अधिकारियों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है और कुछ को अस्पताल में भर्ती होना पड़ रहा है। हालांकि, आयोग का तर्क है कि कुछ अधिकारी इस प्रक्रिया में जानबूझकर लापरवाही बरत रहे हैं। यह सही है कि निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से चुनाव कराने के लिए मतदाता सूचियों में सुधार जरूरी है। मगर सवाल है कि क्या इस कार्य से जुड़े अधिकारियों पर वास्तव में अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है? अगर ऐसा है तो चुनाव आयोग इस परेशानी को नजरअंदाज क्यों कर रहा है?

बिहार के बाद 12 अन्य राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू

बिहार के बाद बारह राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में चार नवंबर से विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू किया गया है, जो चार दिसंबर तक चलेगा। इनमें छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी शामिल हैं। इस प्रक्रिया का जिम्मा मुख्य तौर पर बूथ स्तरीय अधिकारियों को सौंपा गया है। कई राज्यों में इन अधिकारियों की शिकायत है कि उनके पास काम का बोझ बढ़ गया है और उन पर अत्यधिक दबाव बनाया जा रहा है। वहीं आम लोग भी अपनी परेशानियों के लिए इनसे ही जवाब मांगते हैं।

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पश्चिम बंगाल में बीएलओ अधिकार रक्षा समिति के सदस्यों ने सोमवार को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर अपना विरोध दर्ज कराया। उनकी मांग थी पुनरीक्षण की समय सीमा बढ़ाई जाए, ताकि उन्हें काम के दबाव से राहत मिल सके। गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों से बूथ स्तरीय अधिकारियों का स्वास्थ्य खराब होने और अस्पताल में भर्ती होने की खबरें भी आ रही हैं। ऐसे में चुनाव आयोग का दायित्व है कि वह इन अधिकारियों को पेश आ रही दिक्कतों का कोई हल निकाले।

विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग क्यों कर रहा जल्दबाजी

बूथ स्तरीय अधिकारियों का संगठन और विपक्षी दल यह सवाल भी उठा रहे हैं कि विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग जल्दबाजी क्यों कर रहा है। जिस कार्य के लिए दो-तीन माह की जरूरत है, उसे पूरा करने के लिए सिर्फ एक माह की समय सीमा क्यों तय की गई है? अगर कोई अधिकारी काम के इस दबाव को नहीं झेल पाता है तो उसके खिलाफ निर्वाचन संबंधी दायित्वों का निर्वहन नहीं करने के आरोप में मुकदमा दर्ज करना क्या न्यायसंगत है?

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पिछले करीब तीन हफ्तों के भीतर कई राज्यों में हृदयघात, तनाव और आत्महत्या के कारण पंद्रह से अधिक बीएलओ की जान जाने की खबर आई। अगर यह सच है तो वास्तव में मामला गंभीर और संवदेनशील है। निर्वाचन आयोग को इस पर विचार करना चाहिए। उचित समय लेकर पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने की ओर ध्यान देना जरूरी है। इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में शामिल कर्मियों पर काम का अनावश्यक दबाव बनाने से गड़बड़ियों की संभावना ज्यादा है। इससे मतदाता सूचियों की शुचिता सुनिश्चित करने का मकसद भी अधूरा ही रह जाएगा।