विपक्ष के दो बड़े नेताओं के घरों और अन्य ठिकानों पर पड़े छापों को लेकर राजनीति गरम है। विपक्ष का मानना है कि केंद्र सरकार ने बदले की भावना से यह कार्रवाई की है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि भ्रष्ट लोगों के हिसाब देने का समय आ गया है। मंगलवार को राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनके परिजनों से जुड़ी करीब एक हजार करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति की जांच के लिए आयकर विभाग ने दिल्ली, गुरुग्राम और रेवाड़ी जैसी जगहों के बाईस ठिकानों पर छापे मारे। आरोप है कि फर्जी कंपनी बना कर इन जगहों पर बेनामी संपत्ति तब जुटाई गई, जब लालू यादव केंद्र में रेल मंत्री थे। इसी तरह पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम पर आइएनएक्स टेलीविजन कंपनी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी दिलाने की एवज में घूस लेने और संबंधित अधिकारियों को प्रभावित करने का आरोप है। कार्ति ने आइएनएक्स को एफडीआई की मंजूरी उस वक्त दिलवाई जब उनके पिता वित्तमंत्री थे। इसी सिलसिले में सीबीआई ने पी चिदंबरम और उनके बेटे के घरों पर छापे मारे।
यह नई बात नहीं है कि जब कोई पार्टी सत्ता में आती है तो विपक्षी दलों के नेताओं पर शिकंजा कसने की नीयत से उनकी अनियमितताओं का पुलिंदा खोल कर बैठ जाती है। आयकर विभाग और सीबीआई की कार्रवाइयां तेज हो जाती हैं। फिर विपक्षी दल सत्ता पक्ष पर बदले की कार्रवाई का आरोप मढ़ना शुरू कर देते हैं। मगर ऐसे बहुत कम मामले हैं, जिनमें ऐसी कार्रवाइयों का कोई व्यावहारिक नतीजा सामने आता है। भ्रष्टाचार से जुड़े उन्हीं कुछ मामलों में सजा हो सकी है, जिनमें अदालतों का हस्तक्षेप रहा है। ज्यादातर मामलों में यही देखा गया कि सत्ता पक्ष विपक्षी दलों की जुबान बंद करने की मंशा से उनके मुखर नेताओं के भ्रष्टाचार की तरफ अंगुली उठाता है। इसलिए जब केंद्र की भाजपा शासित सरकार ने लालू यादव, पी चिदंबरम, ममता बनर्जी आदि के खिलाफ अनियमितताओं की जांच कराने के आदेश दिए तो उस पर स्वाभाविक रूप से बदले की भावना से काम करने का आरोप लग रहा है। भ्रष्टाचार खत्म करने का दम तो हर सरकार भरती रही है, पर इस दिशा में साफ नीयत से काम न हो पाने की वजह से यह समस्या लगातार बढ़ती रही है। नाहक आयकर विभाग और सीबीआई की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में आती रही है।
अगर लालू यादव, कार्ति चिदंबरम और ऐसे दूसरे लोगों के खिलाफ अनियमितता के पुख्ता सबूत हैं तो उन पर कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। इसमें राजनीतिक गोटियां बिठाने या फिर सबक सिखाने की मंशा नहीं होनी चाहिए। भ्रष्टाचार से पार पाने का जो भरोसा नरेंद्र मोदी सरकार ने जगाया था, उसे पूरा करने के लिए जरूरी है कि पक्ष और विपक्ष का भेद किए बगैर कार्रवाई हो। अगर सिर्फ विपक्ष के नेताओं के खिलाफ कदम उठाए जाएंगे तो उसकी नीयत पर शक स्वाभाविक है। कर्नाटक में भाजपा की सरकार रहते रेड्डी बंधुओं और खुद मुख्यमंत्री रह चुके येदियुरप्पा पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं, उनके खिलाफ भी ऐसी ही कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है। इसी तरह मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों में अनियमितताओं की भी जांच खुलनी चाहिए। मध्यप्रदेश का व्यापम कांड दब गया, उसकी छानबीन क्यों नहीं होनी चाहिए! ऐसे छापों का तभी कोई मतलब होगा, जब लोगों में भरोसा पैदा हो कि सरकार सचमुच भ्रष्टाचार से लड़ रही है।
