भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में जिस तरह के उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, उसमें शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के सीमा पार के दौरे सवालों के घेरे में रहते हैं। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के मुद््दों पर आयोजित बहुपक्षीय सम्मेलन या बातचीत में शामिल होने पर भी नाहक आपत्तियां उठाई जाती हैं। इसी प्रवृत्ति से पैदा हुई स्थिति का सामना गृहमंत्री राजनाथ सिंह को करना पड़ रहा है, जो सार्क देशों के गृह मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान जा रहे हैं।
जमात-उद-दावा के प्रमुख और मुंबई आतंकी हमलों का सरगना माने जाने वाले हाफिज सईद को अपनी सियासत चमकाने या सुर्खियां बटोरने का यह शायद अच्छा मौका लगा। इसलिए सईद ने फौरन यह एलान कर दिया कि अगर राजनाथ सिंह सार्क की मंत्रिस्तरीय बैठक में शामिल होने इस्लामाबाद आएंगे तो जमात-उद-दावा देश भर में उनका विरोध करेगा। हाफिज सईद ने पिछले दिनों में कश्मीर में बुरहान वानी की मौत के बाद हुई हिंसा और बेगुनाह कश्मीरियों की मौत के लिए राजनाथ सिंह को जिम्मेदार बताया है। लेकिन क्या यह कोई छिपी बात है कि कश्मीर में तमाम अलगाववादी संगठनों और आतंकी तत्त्वों की ओर से जो होता है, उसके पीछे कौन खड़ा है? दूसरी ओर, भारत में शिवसेना ने भी इस आधार पर राजनाथ सिंह के इस्लामाबाद जाने का विरोध किया है कि अगर वे कश्मीर में हिंसा के पीछे पाकिस्तान का हाथ मानते हैं तो वहां क्यों जा रहे हैं! लेकिन अच्छा है कि हाफिज सईद की धमकियों या शिवसेना की आपत्तियों की परवाह न कर राजनाथ सिंह अपने तय कार्यक्रम के मुताबिक इस्लामाबाद जाएंगे और सार्क देशों के गृहमंत्रियों के तीन दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न मुद््दों पर भारत का पक्ष रखेंगे। यों भी द्विपक्षीय बातचीत का अवसर नहीं है। इस्लामाबाद आयोजन स्थल भले हो, पर सार्क की बैठक बहुपक्षीय वार्ता का अवसर है। इसलिए भी मुखालफत या एतराज बेमतलब है।
सही है कि कश्मीर में हाल में हुई हिंसा और वहां के मसले पर दोनों देशों के बीच जिस तरह की तनातनी चल रही है, उसमें फिलहाल द्विपक्षीय बैठक पर सवाल उठते। लेकिन यह घोषित है कि राजनाथ सिंह की पाकिस्तान के गृहमंत्री के साथ अलग से कोई बैठक नहीं होगी। सवाल है कि आज भी अगर मुंबई आतंकी हमलों का सरगना हाफिज सईद पाकिस्तान में खुलेआम कश्मीर के मसले पर दखल देने की कोशिश करता है तो ऐसा वह किस हैसियत से करता है और इसकी छूट उसे कहां से मिलती है? इसी रविवार को सईद ने जिस ‘मार्च फॉर कश्मीर’ रैली शुरू की थी, उससे साफ जाहिर है कि इस तरह की गतिविधियों से भारत की कश्मीर नीति को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यह सम्मेलन केवल भारत और पाकिस्तान के बीच किसी खास मसले तक सीमित नहीं है। वहां अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और खासकर दक्षिण एशिया में सुरक्षा संबंधी चुनौतियों पर बात होनी है। यह मसला सार्क के अन्य देशों के साथ-साथ खुद पाकिस्तान के लिए भी बहुत मायने रखता है। इसलिए सार्क की बैठक या उसमें भारत के गृहमंत्री की हिस्सेदारी में व्यवधान डालने की कोशिश करने वालों से पाकिस्तान सरकार को सख्ती से निपटना चाहिए।

