अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम की बाबत बीस मार्च को आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर दलितों का आक्रोश समझा जा सकता है। लेकिन विरोध का अर्थ हिंसा और उपद्रव नहीं होता। इसलिए सोमवार को जो हिंसा और तोड़-फोड़ हुई उसे कतई उचित नहीं कहा जा सकता। भारत बंद कराने के लिए देश के अधिकतर राज्यों में दलितों के संगठन सड़कों पर उतरे। चूंकि विरोध-प्रदर्शनों की अगुआई किसी एक संगठन के हाथ में नहीं थी, इसलिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों को निर्देशित और अनुशासित करना मुश्किल था। लेकिन प्रशासनिक अपरिपक्वता और लापरवाही भी दिखी। ऐसे मौके पर यह पहले से अनुमान लगाया जा सकता है कि गड़बड़ी हो सकती है। और इसके मद््देनजर एहतियाती चौकसी बरती जा सकती है। लेकिन यह बहुत बार होता है कि पुलिस-प्रशासन पहले तो जरूरत से ज्यादा शिथिल रहता है और बाद में स्थिति नियंत्रण से कुछ बाहर होते देख वह अंधाधुंध बल प्रयोग को जरूरी मान लेता है। सोमवार को हुई हिंसा के त्रासद रूप का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें नौ व्यक्तियों की जान चली गई। हो सकता है कई जगह हिंसा के पीछे आंदोलकारियों का नहीं, शरारती तत्त्वों का या सारे प्रसंग को गलत दिशा में मोड़ देने का मंसूबा पाले षड्यंत्रकारी तत्त्वों का हाथ रहा हो। यह भी हुआ होगा कि कई जगह हिंसा पुलिस कार्रवाई की प्रतिक्रिया में भड़की हो।
लेकिन यह हमेशा याद रखना चाहिए कि जहां विरोध-प्रदर्शन के अराजक या उच्छृंखल रूप लेने की आशंका जितनी अधिक रहती है, वहां शरारती या षड्यंत्रकारी तत्त्वों के लिए अपना मतलब साधने की गुंजाइश उतनी ही ज्यादा रहती है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि शांतिपूर्ण आंदोलन कहीं ज्यादा सफल होते हैं, क्योंकि वे अपने संयम और अनुशासन से दूसरे तबकों की भी सहानुभूति या समर्थन हासिल कर पाते हैं। हाल में हुएकिसानों के दो आंदोलन इसके प्रमाण हैं। एक हुआ राजस्थान के सीकर में, जिसमें किसानों के समर्थन में शहर के व्यापारी और दुकानदार, यहां तक कि डीजे वाले भी आ गए। और दूसरा आंदोलन हुआ महाराष्ट्र में। मुंबई के लोगों को आवाजाही में दिक्कत न हो, इसका खयाल कर महाराष्ट्र के किसानों ने मुंबई के आजाद मैदान पहुंचने तक कूच रात में किया। दोनों आंदोलनों का संदेश दूर तक गया। सोमवार को विरोध-प्रदर्शन जिस मुद््दे पर हुए, उसके बजाय हिंसा पर ज्यादा चर्चा हुई। जिस कानून को दलित अपने सुरक्षा-कवच के रूप में देखते आए हैं, उसमें कोई भी फेरबदल की बात उन्हें डराती है। दूसरी ओर, कई अन्य कानूनों की तरह इस कानून के भी दुरुपयोग के कुछ मामले गिनाए जा सकते हैं।
ऐसे में जहां यह जरूरी है कि दुरुपयोग की गुंजाइश को कम से कम किया जाए, वहीं यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को अपमान, भेदभाव, उत्पीड़न और अत्याचार से बचाने के लिए किए विशेष प्रावधान कायम रहें। लेकिन ऐसा लगता है कि अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सर्वोच्च अदालत के पिछले महीने के फैसले से पड़ सकने वाले असर के अलावा दलितों की नाराजगी के कुछ और कारण रहे होंगे। इनमें भीमा-कोरेगांव और भावनगर में पिछले दिनों घुड़सवारी के कारण एक दलित युवक की हत्या और आंबेडकर के नाम में संशोधन करने के उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय जैसी कई घटनाएं भी सबब बनी होंगी। इसी तरह आदिवासियों के आक्रोश-प्रदर्शन के पीछे विस्थापन की पीड़ा भी रही होगी। जो तबके सदियों से समाज के सबसे निचले पायदान पर रहे हैं, उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसलिए भी लोकतांत्रिक तौर-तरीकों का लिहाज किया जाना चाहिए।

