एनएसजी यानी परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह और सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की बाबत भारत की दावेदारी को नॉर्डिक देशों का समर्थन मिलना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। दोनों वैश्विक संस्थाओं में भारत की दावेदारी की हिमायत यों तो कई देश कर चुके हैं, पर नॉर्डिक देश इस मसले पर अब तक चुप ही थे। यह पहला मौका है जब उन्होंने मुंह खोला है। यह भी पहली बार हुआ कि भारत और नॉर्डिक देशों का सम्म्मेलन आयोजित किया गया। नॉर्डिक देशों में स्वीडन, डेनमार्क, आइसलैंड, नार्वे और फिनलैंड आते हैं।
स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुए सम्मेलन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस अवसर पर जारी घोषणापत्र ने विश्व के मौजूदा हालात के मद्देनजर वैश्विक संस्थाओं के पुनर्गठन की जरूरत रेखांकित की है। यह भारत के नजरिए पर ही मुहर है। संयुक्त राष्ट्र का उदय द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुआ था, और सुरक्षा परिषद का स्वरूप विश्व की बड़ी ताकतों ने अपने हिसाब से तय कर दिया। लेकिन तब से दुनिया काफी बदल गई है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
अफ्रीका और लातीनी अमेरिका से कोई भी देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। इसलिए भारत ही नहीं, जर्मनी, जापान, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील भी स्थायी सदस्यता का दावा करते रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि वीटोधारी देश नहीं चाहते कि सुरक्षा परिषद में उनके समकक्ष कोई और आए। इसलिए सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन की जरूरत भले सब स्वीकार करते हों, मगर इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की आम सहमति नहीं बन पाती है। एनएसजी में वीटो जैसा कोई रोड़ा नहीं है, पर चीन ने भारत की राह रोकने की कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
बहरहाल, नॉर्डिक देशों के सम्मेलन के बाद प्रधानमंत्री मोदी लंदन पहुंचे और वहां ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेजा मे के साथ उनकी बातचीत तमाम मुद्दों पर हुई, पर आतंकवाद तथा आपसी व्यापार के मसले ही हावी रहे। मोदी और मे, दोनों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित संगठनों मसलन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल-मुजाहिदीन, हक्कानी नेटवर्क, अल कायदा, आइएसआइएस से निपटने के लिए आपसी सहयोग और बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, ऑनलाइन चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों को भी रोकना होगा। इनमें से अधिकतर आतंकी संगठन पाकिस्तान की जमीन की उपज हैं; बाकी ने भी वहां अपने अड्डे बना रखे हैं। लिहाजा, आतंकवाद को लेकर मोदी और मे की सहमति को पाकिस्तान की कूटनीतिक घेरेबंदी के रूप में भी देखा जा सकता है।
मोदी ऐसे वक्त लंदन गए जब सीरिया के खिलाफ अमेरिका और ब्रिटेन व फ्रांस की साझा सैन्य कार्रवाई को लेकर इन देशों की रूस से तनातनी चल रही है। मोदी ने सीरिया के मामले में भारत का दृष्टिकोण तो रखा, पर रूस का जिक्र किए बगैर। बातचीत में दूसरा अहम मसला निवेश और व्यापार का था। प्रधानमंत्री ने मे को आश्वस्त किया कि ब्रेक्जिट के बाद भी भारत के लिए ब्रिटेन की अहमियत बनी हुई है। जी-20 में ब्रिटेन ऐसा देश है जो भारत में निवेश के मामले में शुरू से अग्रणी रहा है। आधिकारिक अनुमान के मुताबिक दोनों मुल्कों का आपसी व्यापार तेरह अरब डॉलर का है। पिछले साल आपसी व्यापार में खासा इजाफा हुआ। दोनों पक्षों ने इस पर रजामंदी जताई कि द्विपक्षीय व्यापार की राह में आने वाली मुश्किलों को जल्द से जल्द दूर किया जाए। इस अवसर पर एक लाख अरब पाउंड के मुक्त व्यापार करार पर भी सहमति बनी, जो कि आपसी व्यापार को नए मुकाम पर ले जाएगी।

