Indore Contaminated Water Controversy: इंदौर में पेयजल दूषित होने की वजह से कई लोगों की मौत के बाद राहत के तौर पर सरकार की ओर से मुआवजे की घोषणा की गई, लेकिन सवाल है कि क्या कुछ रस्मी औपचारिकताएं पूरी करना इस समस्या का हल हो सकता है! सबसे जरूरी था कि इस घटना के बाद निचले स्तर के संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के समांतर शीर्ष स्तर पर बरती गई लापरवाही के लिए भी जिम्मेदारी तय की जाती। मगर ऐसा लगता है कि इसे किसी सामान्य हादसे की शक्ल में देखा जा रहा है। वरना क्या कारण है कि इतने गंभीर मामले के बाद भी सरकार के रवैये में एक अफसोसनाक उदासीनता दिख रही है।

इसकी जिम्मेदारी लेने के बजाय वहां के एक मंत्री सवालों को जिस तरह बेमानी बता रहे थे, उसमें एक विचित्र उपेक्षाभाव था। अव्वल तो पेयजल जैसी सबसे बुनियादी जरूरत के पूरी तरह सुरक्षित होने को लेकर सरकार अपनी ओर से सजग रहती, लेकिन इसके बजाय मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को यह आदेश देना पड़ा है कि प्रभावित इलाके में पीने के पानी के अतिरिक्त टैंकर भेजे जाएं।

इस घटना से फिर यही जाहिर हुआ है कि महज हादसा या चूक मानी जाने वाली कई घटनाएं अक्सर अधिकारियों की अदूरदर्शिता, लंबे समय से बरती जाने वाली लापरवाही और कई बार जानबूझ कर की गई उपेक्षा का नतीजा होती हैं। इंदौर के जिस इलाके में पेयजल दूषित होने की घटना सामने आई, क्या ऐसा अचानक हो गया होगा? अगर फिलहाल आई खबरों पर ही भरोसा किया जाए कि पानी की आपूर्ति वाले पाइप में गंदे नाले का पानी मिल गया, तो इस पर निगरानी रखना किसकी जिम्मेदारी है? एक बार पेयजल की पाइप बिछा देने के बाद उसमें पानी आ रहा है या नहीं या फिर वह पीने के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित है, इसकी नियमित जांच करने, गड़बड़ियों की निगरानी करने का दायित्व किस पर है?

अगर संबंधित महकमे में निचले स्तर पर तैनात कर्मचारी लापरवाही बरत रहे थे, तो इसका ध्यान रखना किसका काम था? इस गंभीर घटना के बाद सवाल उठने और कठघरे में खड़ा किए जाने के बाद जहां सरकार को इसकी जिम्मेदारी लेकर सख्त संदेश देने वाली कार्रवाई करनी चाहिए थी, वहां उसके मंत्री संवेदनहीन, अवांछित और गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी कर रहे थे। अफसोस की बात यह भी है कि इस समूचे मामले में केंद्र सरकार ने एक तरह से विचित्र चुप्पी साधे रखी और उसकी ओर से कुछ नहीं किया गया। जबकि पिछले कई वर्षों से स्वच्छता के लिए तमगा जीतने वाले इंदौर में दूषित पेयजल से जिस तरह की त्रासद घटना सामने आई, वैसे में पीड़ित परिवारों से लेकर देश भर के आम लोग यह उम्मीद करते हैं कि इसकी गंभीरता के मद्देनजर केंद्र सरकार दखल देगी।

दरअसल, ऐसे नाजुक मौकों पर सबसे ज्यादा जरूरी यह होता है कि सरकार आम लोगों के प्रति संवेदनशील दिखे और इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने देने का भरोसा दे। मगर कम से कम इस मामले में सच यह है कि लोगों का सरकार पर से भरोसा बुरी तरह टूटा है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘हर घर नल जल’ योजना के तहत सभी नागरिकों को पीने का स्वच्छ और शुद्ध पानी मुहैया कराने के दावे किए जाते रहे हैं। मगर पेयजल को लोगों तक पहुंचाने के रास्ते में अगर किसी भी वजह से ऐसी लापरवाही होती है कि उससे लोगों की जान पर खतरा आ जाए, तो ऐसे दावों को किस तरह देखा जाएगा।