लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की बुलाई सर्वदलीय बैठक भी सदन में गतिरोध दूर होने की उम्मीद नहीं जगा पाई। पिछले एक सप्ताह से हंगामे के कारण सदन में कामकाज ठीक से नहीं हो पा रहा। इसलिए लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्षी दलों से अपील की कि वे संसदीय कार्यवाही में बाधा न पहुंचाएं। विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस बात के लिए जरूर लोकसभा अध्यक्ष को आश्वस्त किया कि वे नारे लगाते हुए या विरोध की तख्तियां लेकर उनके आसन तक नहीं जाएंगे, पर सदन में गतिरोध दूर करने की जिम्मेदारी उन्होंने आखिरकार सरकार पर डाल दी। हालांकि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संकेत दिया कि सरकार विपक्ष की आपत्तियों पर चर्चा को तैयार है, पर विपक्ष जिन मुद्दों को लेकर विरोध जता रहा है, उन्हें बातचीत के जरिए रफा-दफा नहीं किया जा सकता।
विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर ललित मोदी को मदद पहुंचाने का आरोप है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर व्यापमं घोटाले और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनियमितता के आरोप हैं। विपक्ष इन नेताओं के इस्तीफे की मांग कर रहा है। मगर सरकार इन्हें दागी नहीं मान रही। वह इस जिद पर अड़ी हुई है कि भाजपा के किसी भी नेता से इस्तीफा नहीं लिया जाएगा। वह इस मसले पर बातचीत करके विपक्ष को संतुष्ट करना चाहती है। पर चूंकि ये मामले आपराधिक प्रकृति के हैं, विपक्ष का तर्क उचित है कि आरोपी नेताओं को अपने पद से अलग हो जाना चाहिए। अदालत के फैसले में बरी होने के बाद वे बेशक अपनी जिम्मेदारी संभाल लें। पर यह बात सरकार के गले नहीं उतर रही।
जब तक सरकार का रुख लचीला नहीं होगा, विपक्ष के हंगामे को रोकना उसके लिए आसान नहीं होगा। यह पहला मौका नहीं है जब आरोपी नेताओं से पद छोड़ने की मांग की जा रही है। भाजपा ने खुद विपक्ष में रहते हुए यूपीए सरकार के समय राष्ट्रमंडल खेल, दूरसंचार स्पेक्ट्रम और कोयला खदानों के आबंटन में हुई अनियमितताओं के खुलासे के बाद सदन के कामकाज को लंबे समय तक रोके रखा था। वह तभी शांत हुई थी जब आरोपी मंत्रियों से इस्तीफे ले लिए गए। अब वही अपने नेताओं के बचाव में जुट गई है। उसे लगता है कि इन नेताओं के अपने पद से अलग होने पर पार्टी की छवि धूमिल होगी।
पर उनसे इस्तीफा न मांग कर वह अपनी छवि को कितना चमकदार बनाए रख पाएगी, कौन दावा कर सकता है! उसने अपने नेताओं को साफ-सुथरा साबित करने के लिए विपक्षी नेताओं के दाग दिखाने शुरू कर दिए। इस तरह बदले की राजनीति करके सरकार न तो अपने नेताओं के दाग छिपाने में कामयाब हो सकती है, न साफ-सुथरे और पारदर्शी तरीके से काम करने के अपने दावे को पुष्ट कर सकती है। ललित मोदी की करतूतें और व्यापमं के खूनी खेल की तहें काफी कुछ उजागर हैं। फिर भी सरकार इन पर परदा डालने में जुटी है।
अगर सदन का कामकाज इसी तरह प्रभावित होता रहा तो यूपीए सरकार की तरह मोदी सरकार को भी बहुत सारे फैसले मंत्रिमंडलीय बैठकों के जरिए करने पड़ेंगे। जिन विधेयकों पर उसकी कई महत्त्वाकांक्षी योजनाएं टिकी हुई हैं, वे लटके रह जाएंगे। अगर मोदी सरकार सचमुच अनियमितताओं के प्रति कठोर और लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत नीतियां बनाने की पक्षधर है, तो उसे अपना अड़ियल रुख छोड़ देना चाहिए।
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