फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मेक्रॉन का भारत आना कई वजहों से अहम माना जाएगा। यूरोप के तीन देश अंतरराष्ट्रीय फलक पर सबसे प्रभावशाली माने जाते रहे हैं- ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी। जहां ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से नाता तोड़ लिया है, वहीं एक समय बुलंदी पर दिख रहीं अंजेला मर्केला अब उतनी प्रभावशाली नहीं रह गई हैं। ऐसे में यूरोपीय संघ में फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मेक्रॉन की भूमिका बढ़ गई है। फिर, उन्होंने सुधार के एक सशक्त एजेंडे के साथ यूरोपीय संघ के सामने अपने को पेश किया भी है। उनकी छवि मजबूत इच्छाशक्ति वाले एक महत्त्वाकांक्षी नेता की है। भारत की उनकी यात्रा दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में चले आ रहे सहयोग का एक नया मुकाम साबित हुई। पर सबसे खास बात हुई रणनीतिक सहयोग को लेकर। यों तो रक्षा क्षेत्र में फ्रांस से भारत का रिश्ता नया नहीं है, पर कुल ले-देकर यह कारोबारी ही रहा है। भारत ने लड़ाकू विमान से लेकर कल-पुर्जों की खरीद और उच्च रक्षा तकनीक हासिल करने में फ्रांस को वरीयता दी है। लेकिन यह शायद पहली बार हुआ कि दोनों देशों के रिश्तों ने एक बहुत महत्त्वपूर्ण आयाम ग्रहण किया।
शनिवार को प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी से मेक्रॉन की बातचीत हुई। इसके बाद मोदी और मेक्रॉन ने एक रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके मुताबिक दोनों देश जरूरत पड़ने पर अपने-अपने नौसैनिक ठिकानों को एक दूसरे के युद्धपोतों के लिए उपलब्ध कराएंगे। फिर, मोदी और मेक्रॉन की मौजूदगी में दोनों देशों के बीच रक्षा, परमाणु ऊर्जा, शिक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और आतंकवाद से मुकाबले आदि की बाबत कई करार हुए। दोनों देशों के बीच एक करार यह भी हुआ कि फ्रांस की एक कंपनी भारत में एक बड़ा एटमी बिजलीघर स्थापित करने का काम तेज करेगी। क्या यह जैतापुर की तरफ इशारा है, जहां विरोध व विवाद के कारण परमाणु बिजलीघर के निर्माण का काम ठप पड़ा है, या कोई नया प्रस्ताव है? जो हो, एक दूसरे को अपने नौसैनिक अड््डे तक रणनीतिक पहुंच की अनुमति देना एक ऐसा करार है जिसने सारी दुनिया के कूटनीतिक मामलों के जानकारों का ध्यान खींचा है। दरअसल, इस सहमति को चीन को रणनीतिक जवाब के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिण चीन सागर में चीन के रवैए से विश्व की सभी अन्य प्रमुख शक्तियां क्षुब्ध हैं। चीन की बेहद महत्त्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट वन रोड’ योजना ने भी उन्हें चिंतित कर रखा है।
दूसरी तरफ, चीन जिस तरह से हिंद महासागर में और दक्षिण एशिया में अपनी सक्रियता बढ़ाता गया है वह भारत के लिए चिंता की बात है। जहां पाकिस्तान के ग्वादर में चीन ने बंदरगाह बना लिया है, वहीं श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह को उसने निन्यानवे साल के लीज पर ले रखा है। चीन ने मालदीव के कई छोटे द्वीप खरीद लिये हैं। हिंद महासागर में स्वेज नहर से लेकर मलक्का की खाड़ी तक चीन की गतिविधियों से तो भारत फिक्रमंद है ही, डोकलाम में फिर से चीन की सैन्य सक्रियता बढ़ने की खबरें भी उसके लिए परेशानी का सबब हैं। ऐसे में, फ्रांस से हुए रणनीतिक समझौते ने परोक्ष रूप से चीन को कड़ा संदेश दिया है। अलबत्ता इस मौके पर न मोदी ने चीन का जिक्र किया न मेक्रॉन ने, न दोनों सरकारों के किसी अन्य प्रतिनिधि ने, लेकिन चीन के सामरिक प्रभाव की काट करने की मंशा इतनी साफ है कि वह बिना कहे भी रेखांकित की जा सकती है।

