लंबे समय से छोटे आधुनिक हथियारों की कमी से जूझ रही भारतीय सेना को नए हथियार मिलने का रास्ता आखिरकार साफ हो गया। रक्षामंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद समिति ने करीब सोलह हजार करोड़ रुपए की खरीद को हरी झंडी दे दी है। इस पैसे से सेना के तीनों अंगों- थलसेना, वायुसेना और नौसेना के लिए छोटे और अत्याधुनिक हथियार खरीदे जाएंगे। भारत को पाकिस्तान और चीन के साथ लगी सीमा पर जिस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उनके मद्देनजर यह फैसला काफी महत्त्वपूर्ण है। सोलह हजार करोड़ रुपए के इस बजट में से सबसे ज्यादा खर्च असॉल्ट राइफलों की खरीद पर होना है। बारह हजार दो सौ अस्सी करोड़ रुपए की सात लाख चालीस हजार असॉल्ट राइफलें खरीदी जाएंगी। सेना को लंबे समय से सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं की रही है। इनकी खरीद में किसी तरह की देरी न हो, इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने इन्हें देश में ही तैयार करने का इरादा बनाया है। रक्षा अनुसंधान संगठन (डीआरडीओ) ने असॉल्ट राइफलों के डिजाइन तैयार किए हैं। एक हजार आठ सौ उन्नीस करोड़ रुपए की हल्की मशीनगनें खरीदी जाएंगी। इसके अलावा नौ सौ बयासी करोड़ रुपए से पांच हजार सात सौ उन्नीस स्नाइपर राइफलें लेने का फैसला हुआ है। इतना ही नहीं, नौ सेना को और ताकतवर बनाने के लिहाज से पनडुब्बी रोधी प्रणाली ‘मारीच’ खरीदी जाएंगी। राइफलों के लिए गोलियां विदेशों से खरीदी जाएंगी।

सैन्य शक्ति के हिसाब से भारतीय सेना दुनिया की ताकतवर सेनाओं में है। सैनिकों के संख्या बल और हथियारों के जखीरे के हिसाब से चीन के बाद दूसरे स्थान पर भारत की सेना ही आती है। ऐसे में यह गंभीर सवाल तो खड़ा होता ही है कि इतनी बड़ी सेना होने के बावजूद हमारे जवानों के पास आधुनिक हथियार क्यों नहीं हैं। क्यों उन्हें पुराने घिसे-पिटे हथियारों से लड़ना पड़ रहा है? ऐसे में जवान देश की क्या, अपनी ही रक्षा नहीं कर पाएंगे! पुराने हथियारों का होना तो जवान के लिए निहत्थे होने जैसा है। जिन छोटे आधुनिक हथियारों की खरीद सरकार अब करने जा रही है उनकी जरूरत पिछले कई सालों से बनी हुई है। सेना के पास हथियारों की भारी कमी का मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है। सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हर साल रक्षा बजट में संतोषजनक प्रावधान होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्यों नहीं समय पर हथियार जवानों के हाथों में पहुंचते? क्यों दस-दस साल तक मामला लटक जाता है? ऐसा नहीं कि हथियारों की खरीद के लिए कोई प्रयास हुए ही नहीं।

असॉल्ट राइफलों और सब मशीनगनों की खरीद के लिए पिछले एक दशक में जो परियोजनाएं बनीं वे सिरे नहीं चढ़ पार्इं। भ्रष्टाचार के आरोपों और खरीद प्रक्रिया तथा तकनीकी मानकों पर खरा नहीं उतरने की वजह से यह काम लंबे समय तक टलता गया। हालत यह है कि सीमा पर डटे जवानों के पास जो राइफल, मशीनगनें और कारबाइन जैसे जो हथियार हैं वे मानक स्तर को पूरा नहीं करते हैं। पाकिस्तान की ओर से आए दिन सीमाई इलाकों में हमले हो रहे हैं। उधर, डोकलाम में चीन की गतिविधियां चुनौती बनी हुई हैं। ऐसे में सेना को अत्याधुनिक हथियारों से तत्काल लैस करने की जरूरत है। देश की सुरक्षा से ज्यादा संवेदनशील मुद्दा कोई नहीं हो सकता, यह हमारे नीति-नियंताओं के लिए प्राथमिकता होनी ही चाहिए!