शनिवार को आए तीन राज्यों के चुनावनतीजे पूर्वोत्तर में भाजपा के जबर्दस्त उभार को रेखांकित करते हैं। दूसरी तरफ, ये चुनाव कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काफी निराशाजनक साबित हुए हैं। त्रिपुरा में माकपा का किला ढह गया, जहां वह ढाई दशक से राज कर रही थी। राज्य की साठ सदस्यीय विधानसभा में भाजपा और आइपीएफटी यानी इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के गठबंधन को तैंतालीस सीटें हासिल हुर्इं। गठबंधन में भाजपा का हिस्सा काफी बड़ा है। त्रिपुरा में भाजपा की ऐतिहासिक सफलता का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछली बार उसे लगभग डेढ़ फीसद वोट ही मिले थे, वहीं इस बार अपनी लड़ी गई इक्वायन सीटों पर उसने तैंतालीस फीसद से अधिक वोट हासिल किए। जबकि माकपा को साढ़े बयालीस फीसद वोट आए। पर ज्यादा अंतर सीटों का है।
माकपा ने पिछली बार पचास सीटें जीती थीं, इस बार वह सोलह सीटों पर सिमट गई। वोट-प्रतिशत और सीटों के इस हिसाब ने एक बार फिर ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ चुनाव प्रणाली पर बहस की गुंजाइश पैदा की है। त्रिपुरा में कांग्रेस को पिछली बार छत्तीस फीसद से कुछ अधिक वोट और दस सीटें मिली थीं, पर इस बार वह एक भी सीट न पा सकी। दरअसल, कांग्रेस का सारा जनाधार भाजपा की तरफ मुड़ गया। इसमें भाजपा की अपनी तूफानी सक्रियता और चतुराई से बनाई गई रणनीति की काफी भूमिका तो है ही, अपना सूपड़ा साफ हो जाने के लिए कांग्रेस भी कुछ कम दोषी नहीं है। काफी समय से त्रिपुरा में कांग्रेस ने विपक्ष की भूमिका निभाना बंद कर दिया था। फिर, इस चुनाव में कांग्रेस ने अपना सारा ध्यान केवल मेघालय पर केंद्रित कर रखा था, जहां वह सत्ता में थी।
नगालैंड में भी कांग्रेस का खाता नहीं खुला। मेघालय में वह अब भी सबसे बड़ी पार्टी जरूर है, पर उसकी सीटें उनतीस से घट कर इक्कीस पर आ गर्इं। नगालैंड और मेघालय में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति है, लिहाजा जोड़-तोड़ से सरकार बनाने की कवायद चल रही है। नगालैंड में 2013 में भाजपा को सिर्फ एक सीट मिली थी, इस बार उसकी झोली में बारह सीटें आई हैं; यहां पिछली बार उसे दो फीसद से भी कम वोट मिले थे, इस बार चौदह फीसद से कुछ ऊपर वोट मिले हैं और सहयोगियों के साथ उसके सत्ता में आने के आसार हैं। इन तीन राज्यों में लोकसभा की कुल मिलाकर केवल पांच सीटें हैं, लेकिन इन नतीजों का संदेश बड़ा है, क्योंकि पूर्वोत्तर भाजपा के लिए परंपरागत पैठ वाला क्षेत्र नहीं था। केंद्र की सत्ता में आने के बाद भाजपा ने पूर्वोत्तर में बहुत तेजी से पैर पसारे हैं। इस तरह ये चुनाव परिणाम भाजपा के भौगोलिक विस्तार की भी पुष्टि करते हैं।
ये नतीजे ऐसे समय आए हैं जब गुजरात में झटका खाने और राजस्थान व मध्यप्रदेश के उपचुनावों में शिकस्त खाने से भाजपा के माथे पर थोड़ी-बहुत चिंता की लकीरें दिख रही थीं। लेकिन कहना मुश्किल है कि आगे जिन राज्यों के चुनाव होने हैं उनके परिणाम पूर्वोत्तर की लकीर पर ही आएंगे। जैसे, राजस्थान और मध्यप्रदेश के उपचुनाव जीतने के बावजूद कांग्रेस को पूर्वोत्तर में इसका कोई लाभ नहीं मिला, वैसे ही सुदूर त्रिपुरा और नगालैंड के चुनाव भी कर्नाटक, राजस्थान और मध्यप्रदेश पर शायद ही कोई असर डाल पाएं। अलबत्ता ताजा नतीजों ने देश भर में भाजपा के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया होगा, और पार्टी जरूर इससे लाभान्वित हो सकती है।

