आखिरकार उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया। जिस तरह देश के कई जाने-माने संविधानविदों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ अपनी राय जाहिर की थी, उसे देखते हुए उपराष्ट्रपति के निर्णय पर शायद ही किसी को हैरानी हुई हो। यों इस प्रस्ताव को विचार और बहस के लिए स्वीकार कर भी लिया जाता, तो इसका पारित हो पाना नाममुकिन था, क्योंकि संसद में इसे पारित कराने लायक संख्याबल विपक्ष के पास नहीं था। यही नहीं, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और राजद जैसी पार्टियां महाभियोग के प्रस्ताव से सहमत नहीं थीं। खुद कांग्रेस के भीतर इस मामले में एक राय नहीं रही है। ऐसे में, प्रस्ताव लाने वाले दलों की रणनीतिक कमजोरी भी जाहिर हुई है। राज्यसभा के सभापति ने प्रस्ताव खारिज करने के पीछे कुल बाईस कारण बताए हैं। इनमें से मुख्य कारणों में एक यह है कि प्रस्ताव लाने वालों ने प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य और तथ्य पेश नहीं किए थे; इसके बजाय संदेहों और अटकलों को आधार बनाया था; ठोस साक्ष्यों और तथ्यों के बजाय ‘ऐसा लगता है’ और ‘हो सकता है’ जैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया था।
ऐसे में प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ जांच का आदेश देने से न्यायपालिका की साख को गंभीर चोट पहुंचती। प्रस्ताव में एक आरोप मुकदमों के आबंटन और उनकी सुनवाई के लिए जजों के चयन में मनमानी का था। चार वरिष्ठ जजों के संवाददाता सम्मेलन से यह विवाद पहले ही तूल पकड़ चुका था। लेकिन उपराष्ट्रपति ने अनेक कानूनविदों से विचार-विमर्श के बाद कहा है कि ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ होने के कारण प्रधान न्यायाधीश को मुकदमों के आबंटन का अधिकार है। उन्होंने प्रस्ताव खारिज करते हुए यह भी जोड़ा है कि परंपरा के खिलाफ नोटिस का मसविदा सार्वजनिक करना गलत है; बारीकी से विचार किए बगैर महाभियोग से न्यायपालिका में भरोसा कम होता है।
सभापति ने अपने निर्णय में कहा है कि सात विपक्षी दलों के राज्यसभा के चौंसठ सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस में प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ लगाए आरोपों के समर्थन में पेश किए गए दस्तावेजों से कोई पर्याप्त साक्ष्य सामने नहीं आता है और संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के तहत उन्हें महाभियोग के तहत हटाने का कोई मामला नहीं बनता है। दूसरी तरफ कांग्रेस ने उपराष्ट्रपति के निर्णय को जल्दबाजी में लिया गया निर्णय करार दिया है। कांग्रेस का कहना है कि संबंधित आरोपों के सबूत और अन्य दस्तावेज सीबीआइ तथा अन्य जांच एजेंसियों के पास हैं; अगर नोटिस स्वीकार कर जांच के लिए समिति गठित की जाती, तो सबूत और गवाह पेश किए जाते।
बहरहाल, प्रस्ताव खारिज होने के बाद भी यह प्रकरण खत्म होने के आसार फिलहाल नहीं दिखते। कांग्रेस ने राज्यसभा के सभापति के निर्णय को असंवैधानिक बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का इरादा जताया है। लेकिन इस पर सुनवाई कौन करेगा, इसका फैसला कैसे होगा, क्योंकि प्रधान न्यायाधीश ही तो मास्टर ऑफ द रोस्टर हैं। फिर, कांग्रेस कानूनी आधार क्या लाएगी, कौन-से उदाहरण पेश करेगी, क्योंकि प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पहले कभी नहीं लाया गया था। चाहे मुकदमों का आबंटन हो या जजों की नियुक्ति के लिए चली आ रही कोलेजियम प्रणाली, दोनों को आदर्श व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। पर इन मसलों का सामना करने का तरीका यह नहीं हो सकता कि शक्तियों के दुरुपयोग की धारणा बना ली जाए। इस तरह के विवाद से किसी को कोई राजनीतिक लाभ हो या न हो, न्यायपालिका की साख और गरिमा को जरूर चोट पहुंचती है।

