पंजाब और उत्तर प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे हैं। ऐसा हर चुनाव में होता है। मगर पंजाब में अजीब खींचतान की स्थिति है। दरअसल, प्रदेश में अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार से लोग असंतुष्ट हैं। प्रकाश सिंह बादल सरकार पर मादक पदार्थों की तस्करी को बढ़ावा देने, कॉरपोरेट कंपनियों को लाभ पहुंचाने, व्यापक भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप लगते रहे हैं। माना जा रहा है कि अकाली दल दुबारा सत्ता में नहीं आएगा। ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि इस असंतोष का लाभ उसे मिल सकता है। ऐसा कई बार हो चुका है कि कांग्रेस से असंतोष का लाभ अकाली दल को मिला और अकाली दल से असंतोष का लाभ कांग्रेस को। इसलिए कांग्रेस को अपने दिन बहुरने की उम्मीद जागी है। मगर केंद्र में कांग्रेस शासन के दौरान हुई अनियमितताओं को लोग अभी भुला नहीं पाए हैं। इसलिए वहां आम आदमी पार्टी ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कर दिए हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल के बजाय लोग एक बार आम आदमी पार्टी को आजमाना चाहते हैं। इसलिए नवजोत सिंह सिद्धू ने भाजपा से इस्तीफा दिया तो कयास लगाए जाने लगे कि वे आम आदमी पार्टी से जुड़ेंगे। मगर अभी उनकी सदस्यता पर परदा पड़ा हुआ है। अब कांग्रेस के अमरिंदर सिंह ने सार्वजनिक रूप से न्योता दिया है कि सिद्धू अगर आना चाहें तो कांग्रेस में उनका स्वागत है। इस बीच आम आदमी पार्टी के वोटों में भी सेंध लगाने की तैयारी हो चुकी है। पंजाब से आम आदमी पार्टी के सांसद धर्मवीर गांधी ने पार्टी के असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं सहित तमाम ऐसे दलों का एक संयुक्त मोर्चा बनाने का एलान किया है, जो पंजाब की खुशहाली के लिए संकल्पबद्ध हैं। इसे योगेंद्र यादव की डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी का भी समर्थन हासिल है।

धर्मवीर गांधी आम आदमी पार्टी के बागी नेता हैं। वे लगातार अरविंद केजरीवाल के कामकाज की आलोचना करते रहे हैं। कुछ महीने पहले उन्होंने आप की कार्यशैली के विरोध में रैली भी निकाली थी। गांधी की छवि साफ-सुथरी है, इसलिए मतदाताओं को उन पर भरोसा हो सकता है। इसी तरह योगेंद्र यादव ने आप के विरुद्ध मोर्चा खोला था और जब उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया तो उन्होंने देश भर में स्वराज अभियान चलाने का संकल्प लिया। अब उन्होंने भी अपनी अलग पार्टी बना ली है। ये दोनों नेता अगर साथ मंच पर खड़े होते और साफ-सुथरी छवि वाले कुछ और नेताओं को अपने साथ जोड़ पाते हैं तो न सिर्फ अकाली दल-भाजपा और कांग्रेस के लिए, बल्कि आम आदमी पार्टी के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। इस बार पंजाब विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार और नशाखोरी बड़े मुद्दे होंगे, मगर पार्टियों के पिछले कामकाज और उनके मुखिया की कार्यशैली भी अहम भूमिका अदा करेगी। दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के कामकाज को लेकर मिलीजुली राय है।

पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली पर लगातार अंगुली उठती रही है। ऐसे में जब पार्टी के असंतुष्ट नेता खुद अलग मोर्चा बना कर चुनौती देने उतर आएं तो उसके लिए मुश्किलें बढ़नी स्वाभाविक हैं। हालांकि भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखते हुए वह अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर सकती है। मगर उसके लिए भी पंजाब की लड़ाई आसान नहीं है। आखिर उन सवालों का सामना उसे भी करना पड़ेगा, जो अकाली दल से पूछे जाएंगे।