जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती गुरुवार को घाटी के हालात पर प्रधानमंत्री से बात करने दिल्ली पहुंचीं। उसी दिन उनकी पार्टी यानी पीडीपी के पुलवामा जिले के अध्यक्ष अब्दुल गनी डार की आतंकवादियों ने गोली मार कर हत्या कर दी। इस घटना ने भी बता दिया कि वहां के हालात कितने बिगड़ चुके हैं। इससे पहले मार्च में भी पीडीपी के अन्य नेता पर आतंकी हमला हुआ था। पर इस वक्त चुनौती केवल आतंकवाद से निपटने की नहीं है। घाटी के लोगों और खासकर युवाओं में फौज, पुलिस, सरकार, सबके प्रति गुस्सा बढ़ता जा रहा है। यों सड़कों पर पत्थरबाजी का क्रम पिछले साल जुलाई से, यानी हिज्बुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से ही कमोबेश जारी रहा है, पर कुछ दिनों से वह सिलसिला चरम पर है। सबसे खटकने वाली बात यह है कि कश्मीर को इन त्रासद स्थितियों से निकालने की कोई राजनीतिक पहल नहीं दिख रही है। पुलिस और फौज का काम हिंसा पर काबू पाना है, उनसे एक बेहद जटिल समस्या की तह में जाने और समाधान की गुंजाइश निकालने या उसके लिए माहौल बनाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

यह उम्मीद तो राजनीतिक नेतृत्व से ही की जानी चाहिए। पर समस्या यह है कि इस मसले पर केंद्र सरकार ने फिलहाल खामोशी अख्तियार कर रखी है। खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से महबूबा मुफ्ती की मुलाकात में राज्य के हालात और भाजपा-पीडीपी गठबंधन के अलावा सिंधु जल समझौते पर भी बात हुई। पर घाटी में सामान्य स्थिति कैसे बहाल हो इस बारे में प्रधानमंत्री ने क्या कहा, यह फिलहाल साफ नहीं हो पाया है। कुछ दिन पहले मोदी जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गए थे। तब उन्होंने वाजपेयी के सूत्र ‘इंसानियत, कश्मीरियत, जम्हूरियत’ को याद किया, पर इसकी सार्थकता तो तभी है जब इस सूत्र के आधार पर कोई पहल हो। आज केंद्र की सत्ता भाजपा के हाथ में है और वह राज्य की सत्ता में भी साझेदार है। लेकिन वाजपेयी ने जब अपना सूत्र दिया था तब घाटी में उम्मीद की लहर दौड़ गई थी, जबकि आज केंद्र के रवैए को लेकर घाटी में घोर निराशा और आक्रोश है। और अब तो पीडीपी भी घाटी में अपनी जमीन खोती जा रही है। यह हैरानी की बात नहीं है। जब भाजपा और पीडीपी का गठबंधन हुआ, तो बहुत-से लोगों को यह विरोधाभासी लगा, पर ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं थी जो इस गठबंधन से जम्मू और कश्मीर के बीच की खाई पटने और साथ ही सांप्रदायिक सौहार्द का भी संदेश फैलने की उम्मीद कर रहे थे। यह उम्मीद निराधार नहीं थी।

भाजपा और पीडीपी ने जो ‘गठबंधन का एजेंडा’ जारी किया था उसमें स्थायी शांति के लिए कदम उठाने और कश्मीर समस्या का राजनीतिक समाधान ढूंढ़ने की बात कही गई थी। मगर गठबंधन का घोषित एजेंडा कागजी होकर रह गया है और आज गठबंधन दिशाहीन नजर आ रहा है। यही नहीं, वह मौजूदा हालात को लेकर पर्याप्त संवेदनशील भी नहीं दिख रहा। घाटी के लोगों में मोहभंग और पराएपन का भाव बढ़ रहा है, जिसकी अभिव्यक्ति पिछले दिनों श्रीनगर लोकसभा सीट के उपचुनाव में भी हुई, जहां महज सात फीसद मतदान हुआ। अशांति के कारण अनंतनाग का उपचुनाव टाल दिया गया, पर अगले महीने जब वह होगा तो क्या श्रीनगर उपचुनाव से बेहतर स्थिति होगी? तमाम गड़बड़ी, अशांति और हिंसा के बीच राज्यपाल शासन लागू होने की भी अटकल लगाई जा रही है। पर इससे किस समस्या का हल निकलेगा?