संसद या विधानमंडलों के चुनावों में उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता और डिग्री पर विवाद की स्थिति में पिछले काफी समय से उलझन कायम थी। अब इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, उससे एक तरह से यह साफ हो गया है कि चुनावों में अगर किसी व्यक्ति ने अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में कोई गलत जानकारी दी है तो उसकी उम्मीदवारी रद्द हो सकती है। अदालत ने इस मामले में अपने फैसले में कहा है कि जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों और फार्म 26 के तहत यह उम्मीदवार का कर्तव्य है कि वह अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में सही जानकारी प्रदान करे। जाहिर है, इस नियम के बाद भी अगर किसी आवेदन या दस्तावेज में गलत सूचना दर्ज की जाती है तो उसकी जिम्मेदारी उम्मीदवार पर ही आना स्वाभाविक है। यह इसलिए भी कि अगर कोई व्यक्ति विधायिका का हिस्सा होने जा रहा है तो उसे सबसे पहले अपने लिए तय किए गए नियम-कायदों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए और उस पर ईमानदारी से अमल करना वह खुद अनिवार्य मानता हो।
अब तक उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता जैसे मामलों पर सवाल उठाने वाले आमतौर पर प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार ही होते थे। इस लिहाज से देखें तो अदालत के ताजा फैसले का एक अहम पहलू यह है कि उसने उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मांगने को मतदाताओं के मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज किया है। यानी अगर कोई मतदाता उम्मीदवार की डिग्रियों के बारे में सूचना चाहता है तो उसे मुहैया कराना उम्मीदवार के लिए कानूनी बाध्यता होगी। ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहे हैं जिसमें किसी व्यक्ति ने विधायिका में अपनी उम्मीदवारी के लिए आवेदन भरते हुए शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत सूचना दर्ज कर दी। ऐसी सूचना की तत्काल पुष्टि हो सके, इसकी व्यवस्था अब तक कमजोर रही है। इसलिए ऐसे लोग नामांकन, मतदान, चुनाव और जीत की प्रक्रिया को पार कर विधायिका का हिस्सा भी बन जाते हैं। मुश्किल तब सामने खड़ी होती है जब किसी तरह का शक होने पर विपक्ष से या कोई और उम्मीदवार जीत गए व्यक्ति की ओर से दी गई सूचना पर सवाल उठा देता है।
कुछ समय पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार में कानून मंत्री रहे जितेंद्र तोमर की स्नातक और कानून की डिग्रियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ, तब स्वाभाविक ही यह सवाल उठा कि जो व्यक्ति गलत सूचना के आधार पर विधायक बन जाता है, वह एक स्वच्छ और ईमानदार शासन की कसौटी पर कितना खरा उतर सकेगा! इसके अलावा, हाल में मौजूदा केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रहीं और अब कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी की ओर से भी अपनी डिग्रियों के बारे में गलत सूचना देने पर सवाल उठाते हुए अदालत में मामला पहुंचा था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने विभिन्न चुनाव लड़ने के लिए चुनाव आयोग में दाखिल हलफनामों में अपनी शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत सूचनाएं दीं।
हालांकि दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने देरी को आधार बना कर यह मामला खारिज कर दिया, लेकिन डिग्री के बारे में गलत जानकारी का सवाल बना रहा। इस लिहाज से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में इस मसले पर बनी धुंध साफ कर दी है। यों भी, कोई नागरिक चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से ईमानदार होने के साथ-साथ अपने बारे में सही जानकारी सामने रखने की अपेक्षा करेगा। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो इससे न सिर्फ उस खास उम्मीदवार के प्रति भरोसा टूटता है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी चोट पहुंचती है।

