अगर किसी शहर को सबसे आधुनिक और सुव्यवस्थित जगहों में शुमार किया जाता हो, तो स्वाभाविक ही यह उम्मीद होगी कि वहां की सुरक्षा व्यवस्था भी चौकस होगी। लेकिन साइबर सिटी कहे जाने वाले गुरुग्राम में हालत यह है कि अकेले सड़क पर निकली महिलाओं के साथ कोई भी आपराधिक घटना हो सकती है। सोमवार की रात करीब आठ बजे गुरुग्राम के सोहना इलाके में एक महिला अपने घर के पास ही टहल रही थी कि कुछ लोगों ने उसे एक कार में खींच लिया। फिर चलती कार में लगभग पांच घंटे तक उससे बलात्कार करते रहे और ग्रेटर नोएडा में एक जगह उसे फेंक कर फरार हो गए। यह हैरानी की बात है कि इतनी देर तक एक चलती कार में अपराध को अंजाम दिया जाता रहा और गुरुग्राम से दिल्ली, फिर ग्रेटर नोएडा के बीच रात भर में कहीं भी जांच या पूछताछ के लिए पुलिस ने उन सबको नहीं रोका। क्या यह समूचे पुलिस महकमे के लिए शर्मनाक नहीं है कि आपराधिक तत्त्वों के भीतर पुलिस का कोई खौफ नहीं रह गया लगता है? इसके अलावा, जो पार्टी आम नागरिकों के सामने पूर्व सरकारों की लापरवाही और असुरक्षा का हवाला देकर और भयमुक्त समाज बनाने का वादा करके ही सत्ता में आई है, क्या उसे अपनी लाचारी पर विचार करना जरूरी लगता है?
गुरुग्राम जैसे शहर में यह हालत कैसे हो गई है कि सड़क पर अकेली निकली कोई महिला सुरक्षित अपने ठिकाने पर पहुंचने को लेकर आशंका से भरी रहती है। हरियाणा की सत्ता जब भाजपा के पास आई तो महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने की तमाम घोषणाएं की गई थीं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की शुरुआत हरियाणा के पानीपत से की थी। मगर आज हकीकत यह है कि इस राज्य के सबसे हाइटेक माने जाने वाले शहर में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। बल्कि पिछले डेढ़-दो साल के दौरान स्थिति और भी खराब हुई है। महज पांच महीनों में वहां बलात्कार की बावन घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें नौ मामले सामूहिक बलात्कार के हैं।
यह धारणा आम है कि देश के दूरदराज के इलाकों के मुकाबले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सुरक्षा-व्यवस्था बेहतर होगी और वहां महिलाएं खुद को एक सुरक्षित माहौल में पाती होंगी। लेकिन सच यह है कि न केवल एनसीआर के दूसरे शहरों, बल्कि दिल्ली में भी महिलाओं के विरुद्ध अपराध की दर बेहद चिंताजनक है। यौनहिंसा की ज्यादातर घटनाओं के बाद पुलिस के लापरवाह रवैये ने अपराधियों को बेखौफ किया है, सरकारों के रुख से निराशा बढ़ी है। असुरक्षा और भय के माहौल में कोई सहज कैसे रह सकता है? सोलह दिसंबर, 2012 की घटना के बाद देश भर में यौनहिंसा के खिलाफ आंदोलन चला था। इसके फलस्वरूप न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक समिति गठित हुई, और फिर समिति की सिफारिशों पर यौनहिंसा संबंधी कानून और सख्त बनाए गए। लेकिन कानूनी प्रावधान और कड़े कर देने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, अगर सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाएं अपर्याप्त और असंवेदनशील हों। यह कड़वी हकीकत ताजा वारदात से एक बार फिर रेखांकित हुई है।

