सरकारी स्कूलों में बच्चों के पोषण का स्तर बेहतर करने और कक्षाओं में उनकी उपस्थिति बढ़ाने के मकसद से मध्याह्न भोजन की महत्वाकांक्षी योजना चलाई जा रही है। मगर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में ऐसे स्कूल भी हैं, जहां के बच्चों को दोपहर का भोजन तो मिल रहा है, लेकिन वह सरकार की ओर से जारी धन के जरिए नहीं, बल्कि शिक्षकों के आपसी सहयोग या दुकानदारों से लिए गए उधार के सहारे।

गौरतलब है कि कुल्लू जिले के आनी और निरमंड खंडों के दो सौ सतहत्तर स्कूलों के लिए पिछले तीन महीने से मध्याह्न भोजन का बजट जारी नहीं हुआ है। शिक्षकों को यह आशंका है कि अगर बच्चों को दोपहर का भोजन मुहैया न कराया जाए, तो उनके खिलाफ विभागीय या निलंबन की कार्रवाई हो सकती है। वहीं बच्चों के पोषण के स्तर में कमी को लेकर भी सवाल उठ सकता है। ऐसे में इस इलाके में स्कूली बच्चों को उनके भरोसे छोड़ने के बजाय शिक्षकों ने अपने बीच आर्थिक सहयोग या फिर आसपास की दुकानों से उधार लेकर मध्याह्न भोजन किसी तरह जारी रखा हुआ है।

शिक्षक संवेदनशील हैं और अपनी जिम्मेदारी समझते हैं

इसमें कोई दोराय नहीं कि सरकारी बजट की राशि जारी न होने के बावजूद जो शिक्षक आपसी आर्थिक सहयोग के जरिए स्कूल में बच्चों को भोजन मुुहैया करा रहे हैं, वे संवेदनशील हैं और अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। सरकारी स्कूलों के बच्चे आमतौर पर कमजोर तबकों से आते हैं और उनका परिवार कई तरह के अभावों का सामना करता है। ऐसे में शिक्षकों ने बच्चों के मध्याह्न भोजन के लिए जिस स्तर पर सहयोग किया, वह मानवीय पहल, प्रशंसा और प्रेरणा का एक सकारात्मक संदर्भ है। निश्चित तौर पर शिक्षकों ने अपनी मानवीय भूमिका का निर्वाह किया।

व्यवस्थागत रूप से मध्याह्न भोजन निर्बाध उपलब्ध कराना किसकी जिम्मेदारी है?

मगर सवाल है कि व्यवस्थागत रूप से मध्याह्न भोजन निर्बाध उपलब्ध कराना किसकी जिम्मेदारी है? राशि की कमी की वजह से बच्चों को दोपहर के भोजन में अड़चन आने की स्थिति में शिक्षकों के भीतर विभागीय कार्रवाई का डर क्यों बैठा? अगर सरकार के कामकाज का तरीका ऐसा है कि किसी जिले के दो खंडों के करीब पौने तीन सौ स्कूलों में मध्याह्न भोजन के लिए राशि जारी नहीं होती, तो इसके लिए कौन जवाबदेह है?

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