ईरान संकट गहरा गया है। अमेरिका के साथ तनाव बढ़ने के बीच उसने व्यावसायिक विमानों के लिए अपने हवाई क्षेत्र बंद कर दिए हैं। भारत के लिए यह संकट केवल एक दूरस्थ आंतरिक उथल-पुथल नहीं, बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया में रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक हितों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। अमेरिका के साथ ईरान की कटुता को देखते हुए साफ है कि वहां के हालात बदतर होते गए हैं।
ऐसे में नई दिल्ली ने अपना राजनयिक दृष्टिकोण सतर्क और व्यावहारिक रखा। भारत ने ईरान के राजनीतिक नेतृत्व के साथ संपर्क बनाए रखा, ताकि रणनीतिक सहयोग को अल्पकालिक उथल-पुथल से बचाया जा सके। अब जबकि हालात बेकाबू हो रहे हैं, वहां फंसे दस हजार भारतीयों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विदेश मंत्रालय का कहना है कि उनके अधिकारी विभिन्न इलाकों में जाकर भारतीयों से संपर्क कर रहे हैं। उन्हें निकालकर स्वदेश लाने पर काम हो रहा है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने कहा है कि वहां से अपने नागरिकों को निकालने की तैयारी पूरी है और शुक्रवार को पहला जत्था भारत पहुंच जाएगा।
ईरान में सत्ता प्रतिष्ठान जनता और सूचना दोनों पर नियंत्रण खोने से चिंतित है। न सिर्फ नागरिकों का सवाल है, वहां के पूरे परिदृश्य ने भारत की चिंता हर तरह से बढ़ा दी है। भारत की सबसे बड़ी चिंता चाबहार बंदरगाह परियोजना है, जिसमें उसने करोड़ों डालर का निवेश किया है। यह परियोजना पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार का काम करती है। ईरान में लंबे समय से जारी अस्थिरता इस परियोजना की समयबद्धता और रणनीतिक महत्त्व को खतरे में डालती है, विशेष रूप से चाबहार-जाहेदान रेलवे लाइन को।
अशांत माहौल चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी दे सकता है, जिससे भारत की क्षेत्रीय और समुद्री स्थिति पर सवाल खड़े हो सकते हैं। क्षेत्रीय समीकरण के अलावा भारत के ऊर्जा हित भी दांव पर हैं, क्योंकि ईरान में राजनीतिक उथल-पुथल क्षेत्रीय ऊर्जा समीकरणों को बाधित कर सकती है और भविष्य के सहयोग को सीमित कर सकती है।
नई चिंता ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसद शुल्क से जुड़ी है। इस साल भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। वह वैश्विक दक्षिण की आवाज उठाता रहा है। इस नाते उसकी भूमिका अहम हो जाती है। इसमें भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करे और वह भी ईरान के आंतरिक संघर्षों या महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में उलझे बिना। तेहरान की स्थिति जटिल दिख रही है। भारत और ईरान के रिश्ते कभी विचारधारा से संचालित नहीं रहे।
ये संबंध भूगोल, पहुंच और क्षेत्रीय संतुलन की जरूरत से बने हैं। ईरान में किसी भी तरह का बड़ा झटका भारत की वर्षों से साधी गई व्यापारिक राहों, कूटनीतिक समीकरणों और सुरक्षा गणनाओं को प्रभावित कर सकता है। यदि स्थिति और बिगड़ती है तो तेल बाजार में अस्थिरता, कीमतों में उछाल और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ना तय है। साथ ही, शरणार्थियों की अप्रत्याशित भीड़ और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में बदलाव की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
