भारत ने सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की आशंका के मद्देनजर दुनिया भर में उठ रहे सवालों के बीच जो रुख अपनाया है वह पूरी तरह वाजिब और विश्व शांति के तकाजों के अनुरूप है। नीदरलैंड में भारतीय राजदूत वेणु राजमणि ने रासायनिक हथियार निषेध संगठन (ओपीसीडब्ल्यू) की कार्यकारी परिषद की बैठक में कहा कि भारत रासायनिक हथियारों के एकदम खिलाफ है, पर इसके कथित इस्तेमाल से जुड़े विषयों की जांच पूरी तरह से रासायनिक हथियार संधि के अनुरूप ही होनी चाहिए। सीरिया की बशर अल-असद सरकार पर यह आरोप है कि उसने अपने घरेलू विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए। इसी बिना पर पिछले दिनों अमेरिका और ब्रिटेन तथा फ्रांस ने सीरिया पर मिसाइलों से हमला किया, और यह दावा किया कि केवल उन जगहों को निशाना बनाया गया जहां रासायनिक हथियार छिपा कर रखे गए थे।
इस सैन्य कार्रवाई ने दुनिया में बड़े पैमाने पर सामरिक टकराव का अंदेशा पैदा कर दिया, क्योंकि सीरिया अकेला नहीं है, रूस भी उसके साथ खड़ा है और 2015 से वहां रूस की फौजी मौजूदगी भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच सीरिया ने अपने विद्रोहियों के खिलाफ रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए थे? इसकी मुकम्मल जांच होनी चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के अपनी रिपोर्ट देने से पहले ही अमेरिका ने हमला बोल दिया। जबकि रासायनिक हथियारों का भंडारण और इस्तेमाल रोकने के लिए बाकायदा एक वैश्विक संस्था ओपीसीडब्ल्यू यानी ‘आर्गनाइजेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वीपन्स’ है, जो कि सीडब्ल्यूसी यानी ‘केमिकल वीपन्स कनवेन्शन’ नामक संधि की देन है।
यह संधि एक तरह से 1925 में रासायनिक हथियारों के खिलाफ बने जेनेवा प्रोटोकॉल का विस्तार है। रासायनिक और जैविक हथियारों को प्रतिबंधित करने की बाबत वैश्विक करार की पहल 1968 में हुई, अठारह देशों की सदस्यता वाली निरस्त्रीकरण समिति के भीतर। सितंबर 1992 में इस समिति ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें रासायनिक हथियारों पर रोक लगाने की वैश्विक संधि का प्रस्तावित मसविदा भी था। फिर, महासभा ने उसी साल नवंबर में संधि को मंजूरी दे दी, और इसे तमाम देशों के हस्ताक्षर के लिए जारी कर दिया गया। दुनिया के 192 देश इस संधि को स्वीकार कर चुके हैं। जाहिर है, लगभग सारी दुनिया इस संधि को मानती है। न मानने वाले अपवाद हैं। मसलन, इजराइल ने इस संधि पर हस्ताक्षर तो किए हैं, पुष्टि नहीं की है। उत्तर कोरिया, मिस्र और दक्षिण सूडान ने तो हस्ताक्षर भी नहीं किए हैं। विडंबना यह है कि जिस सीरिया पर रासायनिक हथियार रखने और उसका इस्तेमाल करने का आरोप लगा है वह भी संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है। संधि के तहत रासायनिक हथियारों का बड़े पैमाने पर उत्पादन, भंडारण और इस्तेमाल प्रतिबंधित है।
एक बहुत सीमित मात्रा में छूट दी गई है, चिकित्सा और वैज्ञानिक अनुसंधान के मकसद से। समस्या यह है कि कई जहरीले रसायनों का दुनिया भर में बड़े पैमाने पर उत्पादन और स्थानांतरण होता है, जो प्रतिबंधित नहीं है, क्योंकि वे औद्योगिक उत्पाद बनाने या औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आते हैं। लिहाजा, रासायनिक हथियारों पर रोक लगाने की कठिनाई वैसी ही है जैसी परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने की। जिस तरह परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग भी है उसी तरह अनेक विषैले रसायनों का भी औद्योगिक उपयोग होता है। लेकिन दुनिया में अगर कहीं रासायनिक हथियार रखने या उसका इस्तेमाल किए जाने की सूचना मिलती है या वैसा आरोप सामने आता है, तो संधि को क्रियान्वित करने वाली संस्था यानी ओपीसीडब्ल्यू को मौके पर जाकर जांच करने का अधिकार है। कार्रवाई की बात उसके बाद आती है। भारत ने जहां रासायनिक हथियारों के खिलाफ होने की बात कह कर सीरिया को सख्त संदेश दिया है, वहीं संधि के प्रावधानों के अनुपालन का प्रश्न उठा कर अमेरिका व उसके मित्र देशों को भी यह जताया है कि उन्हें मनमर्जी करने से बाज आना चाहिए।

