राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का प्रवेश रोकने के लिए लंबे समय से बहसें चलती रही हैं। अमूमन सभी दल और उनके नेता इसे लेकर चिंता जताते हैं, मगर विडंबना यह है कि अब तक कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बन सकी है, जिसमें किसी अपराध में लिप्त रहे व्यक्ति को संसद या विधानसभा में पहुंचने से रोका जा सके।
मौजूदा कानूनों में जो प्रावधान किए भी गए हैं, वे एक स्तर के बाद इस मामले में कारगर नहीं रह पाते। यह बेवजह नहीं है कि आज भी देश की राजनीति को आपराधिक छवि के लोगों से मुक्त करने का काम अधूरा है। अब इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमित्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अगर कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए एक बार दोषी करार दे दिया जाता है तो उसके चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इस रपट को राजनीति में आपराधिक छवि के लोगों के दखल को रोकने की दिशा में एक अहम विचार के रूप में देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत अदालत की ओर से किसी अपराध का दोषी घोषित हो जाने और दो साल से ज्यादा की सजा पाने वालों को चुनाव लड़ने पर पाबंदी है, लेकिन यह अवधि छह साल की है। इस अवधि के बाद वही व्यक्ति फिर से संसद या विधानसभा का चुनाव लड़ सकता और जीतने के बाद जनप्रतिनिधि कहला सकता है।
अब न्यायमित्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांसदों को अधिक पवित्र और कानून का पालन करने वाला होना चाहिए। चूंकि सांसद और विधायक लोगों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए एक बार नैतिक अपराध से जुड़ा पाए जाने के बाद उन्हें स्थायी रूप से चुनावी राजनीति के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में यह पक्ष विचार योग्य हो सकता है कि केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू सेवा नियमों के अनुसार, नैतिक अधमता से जुड़े किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति को सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है, मगर राजनेताओं को इस मामले में अलग स्तर पर क्यों रखा गया है। हालांकि दिसंबर, 2020 में केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और राजनेताओं के बीच तुलना को खारिज कर दिया था। सवाल है कि क्या इसे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना जा सकता है?
जाहिर है, इस मसले पर अब एक सर्वसम्मत निष्कर्ष पर पहुंचने की जरूरत है, जिसके जरिए राजनीति को अपराधीकरण से पूरी तरह मुक्त किया जा सके। लेकिन आज देश भर में ऐसे अनेक सांसद और विधायक हैं, जिनके खिलाफ लंबित मामलों की संख्या बढ़ी है। हाल ही में आई एडीआर यानी एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिसर्च की एक रिपोर्ट में बताया गया कि करीब चालीस फीसद मौजूदा सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।
इनमें से पच्चीस फीसद मामले गंभीर अपराधों से जुड़े हुए हैं, जिनमें हत्या, हत्या की कोशिश, अपहरण, महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे मामले शामिल हैं। सवाल है कि देश की संसद तक में इस स्थिति के रहते राजनीति को आपराधिक छवि से मुक्त करने की सदिच्छा का क्या हासिल होगा! निश्चित रूप से यह एक विद्रूप ही है कि किसी अपराध का दोषी होने और सजायाफ्ता होने के बावजूद कोई व्यक्ति जनता की नुमाइंदगी करने के दावे के साथ चुनाव मैदान में उतरता है। जनता की भलाई करने का वादा और दावा करता है और चुनाव जीत जाने पर विधायिका में बैठ कर कानून बनाने की प्रक्रिया में हिस्सा भी लेता है।
