इसमें कोई दोराय नहीं कि अगर कोई व्यक्ति कानून के विरुद्ध काम करता है तो उस पर कार्रवाई होना चाहिए। मगर कानून को अमल में लाने वाली कोई एजंसी अगर अपने अधिकारों को असीमित मानने लगे और उसके रवैये से मनमानी का संकेत मिलने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। पिछले कुछ समय से प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की सक्रियता ने सबका ध्यान आकृष्ट किया है और यह धारणा बनी है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी आई है।
मगर इसके साथ ही विपक्षी दलों ने कई बार सवाल उठाए हैं कि ईडी अपने अभियानों में सुविधा और आग्रहों के मुताबिक चुने हुए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करती है और उसकी सक्रियता में एक खास तरह का आग्रह दिखता है। विपक्षी पार्टियों के आरोपों को यह मान कर नजरअंदाज कर दिया जा सकता कि वे अपने दल से संबंधित आरोपियों के बचाव में ईडी को कठघरे में खड़ा करती हैं। मगर यह भी सच है कि कई मौके पर खुद अदालतों की ओर से ईडी की कार्यशैली पर अंगुली उठाई गई है।
सवाल है कि किसी कानून पर अमल को लेकर ईडी अगर ईमानदार है, तो बार-बार विपक्षी दलों से लेकर अदालतों तक की ओर से उसकी मंशा पर अंगुली क्यों उठ रही है! बुधवार को नौकरी के बदले जमीन के आरोपों से जुड़े एक मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट की एक विशेष अदालत ने ईडी को फटकार लगाई और उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह एक जांच एजंसी के रूप में कानून के नियमों से बंधी है और वैसे आम नागरिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर सकती, जो संदिग्ध तक नहीं हैं।
जाहिर है, यह ईडी के कामकाज के तौर-तरीकों पर एक बार फिर गहरा सवालिया निशान है, जो उसकी साख को कसौटी पर रखता है। अगर इससे शासन के काम का एक ढांचा तैयार होता है तो उसका लोकतंत्र और जनता के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ेगा। विडंबना यह है कि ईडी के रवैये की वजह से पिछले कुछ समय से इस संबंध में कई सवाल उठे हैं।
शायद इसी वजह से अदालत ने यह भी कहा कि इतिहास से कोई सबक सीखना है तो यह देखना चाहिए कि मजबूत नेता, कानून और एजंसियां आमतौर पर उन्हीं नागरिकों को निशाना बनाती हैं, जिनकी रक्षा का वे संकल्प लेती हैं। इस टिप्पणी को जनता के अधिकार और राज्य के कर्तव्य के संदर्भ में देखा जा सकता है, जिसमें उम्मीद की जाती है कि लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जाएगा।
करीब एक वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी ईडी को यह सलाह दी गई थी कि वह अपनी कार्यशैली से भय का माहौल पैदा न करे। शीर्ष अदालत की टिप्पणी इस बात का इशारा थी कि एजंसी को राजनीतिक विरोधियों पर लगे आरोपों की जांच को लेकर संतुलित रुख अख्तियार करने की जरूरत है। आखिर ऐसी शिकायतों की नौबत क्यों आनी चाहिए कि किसी एजंसी के अधिकारियों के पेश आने का तरीका कई बार भयादोहन की तरह लगने लगता है।
इस तरह के व्यवहार का एक स्वाभाविक नतीजा यह होता है कि वास्तविक कारण भी संदिग्ध लगने लगते हैं। ऐसे में ईडी के सामने यह विचार करने का वक्त है कि विपक्षी दलों से लेकर अदालतों तक के बीच उसकी कार्यशैली को लेकर जैसी राय बन रही है, वह उसकी साख को किस हद तक प्रभावित कर रही है और उसे अपने तौर-तरीके में क्या सुधार करने की जरूरत है!
