जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में हुए हादसे में जिस तरह दस जवानों की जान चली गई, वह दुर्गम इलाके में तैनात सुरक्षा बलों के सामने मौजूद बहुस्तरीय जोखिम का ही उदाहरण है। गौरतलब है कि गुरुवार को डोडा में सेना के एक बुलेटप्रूफ वाहन में सवार फौजी लगभग नौ हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित एक चौकी की ओर जा रहे थे। इस बीच खन्नी टाप के पास वाहन सड़क से फिसल कर दो सौ फुट गहरी खाई में जा गिरा। इतनी ऊंचाई से गिरने के बाद वाहन और उसमें सवार लोगों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। दस जवानों की मौत के अलावा ग्यारह अन्य जवान बुरी तरह घायल भी हुए।
जाहिर है, आतंकवाद का सामना करने के क्रम में जानलेवा खतरों और हमलों का सामना करने के अलावा इस घटना से वहां ड्यूटी के लिए तैनात सुरक्षा बलों के सामने एक अतिरिक्त चुनौती का पता चलता है। यह इलाका अपनी बेहद मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता रहा है और वहां सुरक्षा बलों के जवानों के सामने हमेशा ही जोखिम की स्थिति बनी रहती है। ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों के बीच आतंकवादियों का सामना करना पहले ही एक बड़ी चुनौती रही है।
उसमें जब सुरक्षा कारणों से ही सड़कों पर सफर के क्रम में हुए हादसे में जवानों की मौत हो जाती है, तो यह वाहन चलाने में हुई मामूली चूक के खतरनाक नतीजों के साथ-साथ दुर्गम इलाकों में मौजूद रास्तों के बेहद असुरक्षित होने का भी सबूत है। सवाल है कि देश की सुरक्षा के लिहाज से अतिसंवेदनशील इलाकों में सड़कों को इस हालत में कैसे छोड़ा गया है कि किसी वाहन के खाई में गिरने के बाद उसमें सवार लोगों के जिंदा बचने की गुंजाइश बेहद कम होती है।
अफसोस की बात यह है कि उस समूचे क्षेत्र में सुरक्षा बलों के सामने मौजूद अलग-अलग जोखिम के समांतर बचाव के मोर्चे पर शायद पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। वरना हादसे और जोखिम के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील जगहों पर सड़कों के किनारे मजबूत सुरक्षा घेरा या पैराफिट लगाने भर से पहाड़ी इलाकों में होने वाले हादसों में जानमाल के नुकसान को कम किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी और ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में वाहनों के दुर्घटना का शिकार होने और जवानों की मौत या उनके घायल होने की घटनाएं अक्सर सामने आती रही हैं। वाहन पर से चालक का नियंत्रण खोना एक कारण हो सकता है, लेकिन उस क्षेत्र में संकरी और घुमावदार सड़कों के तीखे मोड़ पर फिसलन का खतरा बना रहता है।
ताजा घटना में जिस खन्नी टाप पर सेना का वाहन हादसे का शिकार हुआ, उस तरह की जगहों पर ऊंचाई और कंकड़-मिट्टी की वजह से फिसलन ज्यादा घातक हो जाती है। खासतौर पर दिसंबर-जनवरी के बीच ज्यादा ठंड और बर्फबारी की वजह से सड़क पर फिसलन आम रहती है।
ऐसे में उन सड़कों से अगर भारी सैन्य वाहन गुजरते हैं, तो ऊंचाई वाली जगहों पर कई बार वाहन पर नियंत्रण मुश्किल काम होता है और उसमें चूक की आशंका बनी रहती है। हादसों पर लगाम के लिए इलाके में तैनात जवानों को खराब मौसम और परिस्थिति के मुताबिक बेहतर प्रशिक्षण तथा वाहनों के रखरखाव के पहलू पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए।
सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि सड़कों के बुनियादी ढांचे पर ठोस काम हो और उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाने के इंतजाम किए जाएं, ताकि देश की सुरक्षा और आतंकवाद का सामना करने के लिए तैनात सुरक्षा बलों के जवानों के सामने हादसों में जान गंवाने की नौबत न आए।
