Delhi Turkman Gate Violence: अगर कोई व्यक्ति या समूह किसी बात से सहमत नहीं है, तो वह अपना विरोध प्रकट कर सकता है। मगर इसका तरीका कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण और अहिंसक होना चाहिए। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन यह अधिकार कानून व्यवस्था को बिगाड़ने की अनुमति नहीं देता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान इलाके में एक धार्मिक स्थल के निकट बुधवार तड़के अतिक्रमण रोधी अभियान के दौरान पथराव की घटना गंभीर चिंता पैदा करती है, जिसमें पांच पुलिसकर्मी घायल हो गए।

सवाल है कि विरोध प्रदर्शन हिंसक कैसे हो गया? क्या वजह रही कि लोगों ने पुलिस कार्रवाई को रोकने के लिए ईंट-पत्थरों का सहारा लिया? दरअसल, सोशल मीडिया पर फैलाई गई अफवाहों ने इस घटना को हिंसक रूप दे दिया, जिसमें दावा किया गया कि अतिक्रमण रोधी अभियान के दौरान एक धार्मिक स्थल को ध्वस्त किया जा रहा है। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए और पुलिस बल पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। हालात बिगड़ते देख भीड़ पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस को भी हल्का बल प्रयोग और आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा।

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गौरतलब है कि पत्थरबाजी की घटनाएं पहले कश्मीर में आए दिन देखी जाती थी। कई बार तो आतंकियों को बचाने के लिए भी सुरक्षाबलों पर पथराव किया जाता था। यहां तक कि मुठभेड़ के दौरान भी सुरक्षा कर्मियों को रोकने के लिए पत्थरबाजी को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, सरकार और प्रशासन की सख्ती से हाल के वर्षों में घाटी में इस तरह की घटनाएं काफी कम हो गई हैं। मगर, विरोध प्रदर्शन के नाम पर इसी तरह के कृत्य अब दूसरे राज्यों में भी देखने को मिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा का प्रकरण भी काफी चर्चा में रहा है, जिसमें पुलिस बल पर जमकर पथराव किया गया था।

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अब दिल्ली में इसी तरह की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया के दुरुपयोग को लेकर भी नए सिरे से बहस जोर पकड़ने लगी है। यह अक्सर देखा गया है कि इस तरह के मामलों में लोगों को एक जगह एकत्रित करने और उन्हें हिंसा के लिए उकसाने में सोशल मीडिया पर अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं का सहारा लिया जाता है। पुलिस के मुताबिक, अदालत ने रामलीला मैदान इलाके में एक धार्मिक स्थल के निकट स्थित औषधालय सहित कुछ व्यावसायिक ढांचों को अतिक्रमण घोषित किया था और इसे हटाने के लिए दिल्ली नगर निगम के कर्मी पुलिस बल के साथ मौके पर गए थे। इसी बीच, सोशल मीडिया पर यह अफवाह फैला दी गई कि इलाके में स्थित धार्मिक स्थल को ध्वस्त करने का प्रयास किया जा रहा है।

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सवाल है कि जब अदालत ने इन व्यावसायिक ढांचों को अतिक्रमण करार दिया था, तो लोग बिना सोचे-समझे इतने आक्रामक कैसे हो गए? जबकि जिस धार्मिक संरचना को गिराने की अफवाह फैलाई गई, वह पुलिस कार्रवाई का हिस्सा थी ही नहीं। पुलिस अब इस बात की जांच भी कर रही है कि पथराव की यह घटना अचानक हुई या फिर किसी पूर्व नियोजित साजिश के तहत इसे अंजाम दिया गया। यह आशंका इसलिए भी जताई जा रही है, क्योंकि पुलिस कार्रवाई अदालत के फैसले के बाद की गई और अगर स्थानीय लोगों को कोई आपत्ति थी, तो वे समय रहते ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटा सकते थे। इस घटना में जो भी दोषी हैं, उन्हें न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए।

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