पिछले कुछ दिनों से यह बहस सुनने को मिलती रही है कि भारत के कुछ हिस्सों और राजधानी दिल्ली में कोरोना संक्रमण सामुदायिक संक्रमण के चरण में पहुंच गया है। लेकिन गुरुवार को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने इसे गलत बताया और साफ तौर पर कहा कि देश में कोरोना महामारी के सामुदायिक संक्रमण का दौर नहीं आया है। निश्चित रूप से आइसीएमआर का यह स्पष्टीकरण राहत देने वाला है, लेकिन चिंता की बात यह है कि जिस तेजी से अब संक्रमण फैल रहा है और संक्रमितों व मरने वालों के आंकड़े नित नए रेकार्ड बना रहे हैं, वह कहीं बड़े खतरे का संकेत है। महामारी अभी तक भले सामुदायिक स्तर पर न फैली हो, लेकिन देश के कई शहरों में जिस तेजी से अचानक नए मामले सामने आ रहे हैं, उससे लग रहा है कि खतरा अब ज्यादा तीव्रता के साथ बढ़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और महामारी विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि भारत में जून और जुलाई के महीने में कोरोना संक्रमण के मामले उच्चतम स्तर पर होंगे। इस लिहाज से आने वाला वक्त ज्यादा चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यही वह वक्त होगा जब देश में संक्रमण सामुदायिक चरण में प्रवेश कर सकता है। हालांकि आइसीएमआर का सिरो सर्वे बता रहा है कि अभी तक भारत में कोरोना संक्रमण अभी तक एक फीसद आबादी तक भी नहीं पहुंचा है, इसलिए फिलहाल इसे सामुदायिक संक्रमण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पर यह सर्वे तीस अप्रैल तक के आंकड़ों पर ही आधारित है। जबकि हकीकत यह है कि देश में पिछले एक महीने में हालात ज्यादा बिगड़े हैं। महारार्ष्ध और खासतौर से मुंबई, दिल्ली, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में जिस तेजी से संक्रमण फैल रहा है, वह सामुदायिक संक्रमण की स्थिति से बहुत दूर नहीं है। अगर आइसीएमआर का यही सर्वे आज की स्थिति में हो तो महामारी की तस्वीर कहीं ज्यादा भयावह होगी। सिरो सर्वे में देश के तिरासी जिलों के छब्बीस हजार चार सौ लोगों की जांच गई थी। लेकिन संक्रमित लोगों की बेकाबू होती संख्या असलियत बताने के लिए काफी है।
ज्यादा बड़ा संकट अब यह है कि कोरोना संक्रमण को महानगरों के उन इलाकों में फैलने से कैसे रोका जाए जो बेहद घनी आबादी वाले हैं। आइसीएमआर ने इस खतरे का संकेत दे दिया है कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी झुग्गी-बस्तियों में संक्रमण फैलने का खतरा अब ज्यादा है। यह संकट इसलिए भी गहरा सकता है क्योंकि अब पूर्णबंदी में ढील की वजह से लोगों की आवाजाही फिर से बढ़ गई है। शहरी क्षेत्रों में कामगारों का बड़ा तबका झुग्गी बस्तियों में रहता है। स्वच्छता के मामले में झुग्गी-बस्तियों की हालत शोचनीय है, पीने के साफ पानी से लेकर एक स्वस्थ्य रहन-सहन के लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव है। चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में जब इन बस्तियों में रहने वाले लोग काम-धंधे के लिए बाहर निकलेंगे तो संक्रमित होने का खतरा बढ़ेगा। सिर्फ मास्क लगाने से तो बचाव हो नहीं सकता। झुग्गी बस्तियों में सुरक्षित दूरी का पालन असंभव ही प्रतीत होता है। यही खतरा ग्रामीण इलाकों में भी बराबर से है। प्रवासी कामगारों में जिस तरह से कोरोना के मामले देखने को मिल रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। ऐसे में सरकारों को अब ज्यादा सतर्कता, जिम्मेदारी और सुनियोजित तरीके से कोरोना से लड़ना होगा।
