जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो यह व्यवस्था में एक गहरी और चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। इससे आमजन में असुरक्षा, निराशा और अविश्वास की भावना पैदा होना स्वाभाविक है। अगर कानून व्यवस्था का जिम्मा संभालने वाले ही आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने लगें, तो सुरक्षा और न्याय की उम्मीद किससे की जाए! बिहार में एक ऐसी ही चौंका देने वाली घटना सामने आई है, जिसमें करीब डेढ़ करोड़ रुपए के सोने की लूट की जांच कर रहा राजकीय रेलवे पुलिस का अधिकारी ही मामले में संलिप्त पाया गया।

इस बात का खुलासा तब हुआ, जब पटना रेलवे पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में विशेष जांच दल ने गहन तहकीकात की। हैरत की बात है कि जिस अधिकारी को रेल में सफर के दौरान यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई थी, वही अपराधियों की जमात में खड़ा पाया गया। ऐसे में यह सवाल और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि व्यवस्था में पनप रहे इस तरह के भ्रष्टाचार और अपराध के दरख्तों को खाद-पानी कहां से मिल रहा है?

गौरतलब है कि कोलकाता स्थित एक स्वर्ण कारोबारी के कर्मचारी ने बिहार के गया रेल थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि गत वर्ष नवंबर में हावड़ा-बीकानेर एक्सप्रेस रेल में यात्रा के दौरान गया स्टेशन पर पुलिस वर्दी में चार लोग ट्रेन में सवार हुए। पहले उन्होंने सोने को लेकर उनसे पूछताछ की और बाद में वे एक किलो सोने के बिस्कुट लेकर फरार हो गए।

इसके बाद गया रेल थाना प्रभारी ने जांच शुरू की। जाहिर है कि जब लूट में शामिल पुलिस अधिकारी ही जांच कर रहा हो, तो सच सामने आने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। भारतीय रेल आए दिन अलग-अलग बहाने से किराए में बढ़ोतरी करने या अधिक पैसे वसूलने में तो कोई संकोच नहीं करती, लेकिन यात्रियों के सुरक्षित और सुविधाजनक सफर को सुनिश्चित करने में शायद उसकी कोई रुचि नहीं है।

विडंबना यह है कि यात्रियों के सामने आपराधिक तत्त्वों के अलावा अब वैसे लोगों से भी खुद को बचाने की चुनौती है, जो उनकी सुरक्षा के लिए ही तैनात किए जाते हैं।