अपने एक शिष्य की नाबालिग बच्ची से बलात्कार के मामले में आसाराम को अदालत ने जो सजा सुनाई उसके कई संदेश हैं। पहला संदेश यही है कि कोई कितना भी ताकतवर और प्रभावशाली और पहुंच वाला क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। दूसरा संदेश यह है कि अध्यात्म की आड़ लेकर अपराध पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। समाज को भी चाहिए कि वह ऐसे तथाकथित संतों और बाबाओं की असलियत को समझे और उनसे दूर रहे। जोधपुर की विशेष अदालत ने आसाराम को मृत्युपर्यन्त कारावास की सजा सुनाई है।
वहीं इस अपराध में सहयोगी रहे दो आरोपियों को बीस-बीस साल की सजा हुई है। अलबत्ता अदालत ने दो अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। विशेष अदालत का यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब देश में बलात्कार खासकर बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाओं को लेकर दुख और आक्रोश का माहौल है। लिहाजा, आसाराम को सुनाई गई सजा का स्वाभाविक ही चौतरफा स्वागत हुआ है।
संभवत: पोक्सो के तहत यह पहला मामला है जिसमें कड़ी से कड़ी सजा सुनाई गई है। यह बात आसाराम के रसूख को देखते हुए और भी मायने रखती है और न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बढ़ाने वाली है। जिस शख्स के पास आंख मूंद कर श्रद्धा रखने वालों की एक बड़ी तादाद हो, जो सैकड़ों आश्रमों और हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति का मालिक हो और अनेक नेता भक्तिभाव से जिसके चरण छूते रहे हों, उसने तो यही सोचा होगा कि वह कुछ भी करे उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। आसाराम ने जघन्य अपराध तो किया ही, बाद में भी एक अपराधी जैसा ही बर्ताव किया।
अपने किए को स्वीकार करने और उस पर पश्चात्ताप प्रकट करने के बजाय वह अपने अपराध पर पर्दा डालने और सबूतों को नष्ट करने में जुट गया, जघन्यता की नई हदें पार करते हुए। पीड़िता के परिवार को धमकियां मिलती रहीं। तीन गवाहों की हत्या हो गई। आसाराम के खिलाफ कई नए मामले खुले। आसाराम पर गुजरात के सूरत में भी बलात्कार का एक मामला चल रहा है। अगर आसाराम जेल में है और मृत्युपर्यन्त कैद का भागी बना है तो इसके लिए पीड़िता के परिवार की हिम्मत की दाद देनी होगी, जिन्होंने जाने कितनी धमकियों और आतंक का सामना किया होगा। अदालत ने भी सख्ती दिखाई। आसाराम ने बारह बार जमानत याचिका दायर की, जिसे छह बार निचली अदालत ने, तीन बार राजस्थान उच्च न्यायालय ने और तीन बार सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज किया। राजस्थान पुलिस ने भी, किसी भी दबाव की परवाह न करते हुए, अपने कर्तव्य का पालन किया।
इस तरह यह मामला जांच के स्तर से लेकर न्याय प्रक्रिया के स्तर तक, कर्तव्य पालन की एक उजली मिसाल है। शायद यह इसलिए भी संभव हुआ हो कि यह एक बहुचर्चित मामला था और इसके पग-पग पर मीडिया समेत पूरे देश की निगाह थी। लेकिन यह सामान्य हकीकत नहीं है। सामान्य और कड़वी सच्चाई तो यह है, जिसकी कई सर्वेक्षणों ने भी पुष्टि की है, कि बलात्कार के बहुत सारे मामले दर्ज ही नहीं होते हैं। इसके पीछे दो तरह का भय होता है। एक तो समाज की तिरस्कार-भरी सोच का, जो बलात्कार के शिकार को जीने नहीं देती। दूसरा भय होता है आरोपियों का। बलात्कार के मामलों को लेकर जो उद्वेलन दिख रहा है उसकी सार्थक परिणति इन दोनों प्रकार के भय से पार पाने में ही हो सकती है।

