प्रतिभा कटियार

हाल में स्कूल खुले, बच्चे स्कूल आए। फिर क्या हुआ? शिक्षकों की माथे की सलवटें बढ़ी ही हुई थीं, वे और बढ़ीं। स्थितियां ठीक नहीं होनी थीं, नहीं हुर्इं। मुश्किल इतनी भर नहीं थी कि बच्चे को जो आता था, वे भूल गए हैं। इतनी भर भी नहीं कि बच्चों ने एक कक्षा में जो पढ़ा था, वह भूल गए और उसके बाद की एक कक्षा को बिना पढ़े ही पास कर लिया है। यानी कक्षा एक का बच्चा कक्षा तीन में आ पहुंचा है, जबकि उसके साथ काम होना था कक्षा एक और दो की दक्षताओं पर। शिक्षकों के सामने बच्चे हैं और उनकी भूली-बिसरी दक्षताएं हैं और वर्तमान कक्षा की पाठ्यपुस्तक है।

शिक्षकों के सम्मुख सामने खड़ा मार्च है, जिसके बाद बच्चे एक कक्षा और आगे पहुंच जाएंगे। मुश्किल यह भी नहीं कि जो योजनाएं बनार्इं, सोचीं, जिन पर काम करना शुरू किया, उन पर महामारी के बहुरूप के बादल मंडराने लगे। इसके चलते चुनाव भले ही न स्थगित हुए हों, शादियां भले ही शान से गाजे-बाजे से हो रही हों, बाजार भले ही अपनी धज में लोगों की भीड़ से घिरे हों, लेकिन स्कूलों के बंद होने का संकट आना ही था, सो आ गया।

मैं कहूं कि इन सब मुश्किलों को मुश्किल नहीं माना जाए, तो आप कहेंगे कि मजाक कर रही हूं शायद। लेकिन यह मजाक नहीं, क्योंकि इन तमाम मुश्किलों से बड़ी भी एक मुश्किल है, वह है महामारी के भयावह दौर से जूझ कर स्कूल आ रहे बच्चों के मन को समझने की। यह जो सीखने-सिखाने की हड़बड़ी है, इसमें कहीं चूक न हो जाए, कहीं ऐसा न हो कि अनजाने ही एक उदास मन भाषा और गणित सीखने के दबाव में आने लगे।

एक बार एक शिक्षिका ने भावुक होकर कहा था- ‘जब उस भयावह समय को पार करके हम सुरक्षित स्कूल आ गए हैं, बच्चे भी स्कूल में हैं तो इसके बाद तो सब मुश्किल छोटी ही है। सबसे बड़ी मुश्किल यही थी कि हम सब सुरक्षित रहें। बच्चे स्कूल में आ गए हैं तो सिखा तो हम उन्हें लेंगे ही। थोड़ा वक्त ही तो लगेगा। थोड़ी ज्यादा मेहनत ही तो करनी पड़ेगी। कर लेंगे।’ यह कहते हुए उन शिक्षिका की आंखें नम थीं और आवाज में ‘कुछ कर ही लेंगे’ का आत्मविश्वास था।

असल बात यही है, इसे ही समझना है। जितने शिक्षकों से मैं मिली हूं, अब तक ज्यादातर शिक्षक इस विषम परिस्थिति से जूझने के लिए मन से तैयार हैं। उनकी चिंता से काफी आगे निकल गए हैं उनके प्रयास। वे यह बात समझ रहे हैं कि महामारी के इस दौर ने सबसे ज्यादा नुक्सान किया है शिक्षा का। और इस नुकसान को कम कर पाने की जिम्मेदारी अब उन पर है, जो आसान तो नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं।

लेकिन इस सबमें जो सिरे छूट जाने की गुंजाइश है, वह है सिखाने की हड़बड़ी में बच्चों के मन का, उनके घर परिवार के हालात का, उनके स्वास्थ्य का खयाल रखना। इसका सीधा रिश्ता है सीखने से। बच्चों के सिर पर हाथ फेरने का समय है, उन्हें भरोसा दिलाने का कि ‘कोई बात नहीं, तुम कुछ भूले हो तो कुछ नया सीखा भी तो है। कोई बात नहीं मैं हूं न? हम मिल कर सब सीख जाएंगे जल्दी से।’ यह ‘मैं हूं न’ जो है, यह जादू-सा असर रखता है। यह जो सीखने वाले की क्षमता पर भरोसा करना है, इसका करिश्मा अलग ही होता है।

जो बच्चे पिछली कक्षा की दक्षताएं भूल गए हैं, वह उनकी गलती नहीं है, तो उन्हें इसका जिम्मेदार मानने से बचना शायद पहली जरूरत है। सरकारी स्कूल के बच्चों के जानिब यह बात समझनी बहुत ज्यादा जरूरी है कि इन बच्चों से घर से सीखकर आने की, होमवर्क करने की, ट्यूशन पढ़ने की, मां-बाप पढ़ाएंगे, ये थोड़ी ज्यादा अपेक्षाएं हैं। इन्हें घर के काम करने होते हैं। मां-बाप की लड़ाई दो वक्त की रोटी की है।

बच्चे स्कूल से लौटते हैं तो घर के काम में हाथ बंटाते हैं। कई बच्चे स्कूल जाने से पहले घर के काम करके जाते हैं। सामान्य हालात में भी यह बात इतनी ही सच थी, जितनी इन कठिन दिनों में है। शिक्षक जब बच्चों के सामाजिक, आर्थिक परिवेश की बाबत संवेदनशील होते हैं, तब वे बच्चों के सीखने के मन की उन खिड़कियों और दरवाजों का पता मालूम कर पाते हैं, जिन्हें खोल कर सिखाना न सिर्फ आसान हो जाता है, बल्कि उसकी गति भी बढ़ जाती है।

मैं मिली हूं ऐसे शिक्षकों से जिनके बच्चों को यही लगता रहा कि वे तो खेल रहे हैं, कहानी सुन रहे हैं, पेंटिंग कर रहे हैं, लेकिन असल में उनका सीखना हो रहा था। मुश्किलें सचमुच बहुत बड़ी हैं, लेकिन उनसे निकलने के रास्ते बेहद सरल हैं। सीखने की इच्छा का संबंध सिखाने के ढंग से कायम हो जाए बस। शायद इस तरह कक्षा में चुप बैठी अनम की उदासी भी टूटे और उसकी कापी में उभरने लगें कुछ शब्द, कुछ अंक..!