आजकल दिवाली से जुड़े उत्पादों को लेकर अनेक अपीलें की जा रही हैं कि इस बार स्वदेशी अपनाओ और विदेशी उत्पादों, मूलत: चीनी उत्पादों को ना कहो। यह एक अच्छा और दूरदर्शी कदम साबित होगा अगर इन अपीलों से पिछले वर्ष की तुलना में महज दस फीसद भी स्वदेशी उत्पादों की अधिक बिक्री हो।
लेकिन यहां जरा इसके पीछे अर्थशास्त्र को भी समझते चलें कि वास्तविकता और आदर्शवाद में कितना अंतर है! एक उदाहरण लें। दिवाली में प्रयोग होने वाली और घर-घर में लटकने वाली रस्सीनुमा लाइट्स को आप दिल्ली के चांदनी चौक जैसे बाजार में खरीदने जाएं तो चीन में बना यह उत्पाद बीस रुपए में आसानी से मिल जाएगा। यदि यही उत्पाद ‘इंडिया मेड’ खरीदने की कोशिश करें तो कम से कम 150 रुपए से इसकी शुरुआत होगी।
जब हम किसी भारतीय निर्माता से इस अंतर का मूल कारण जानना चाहेंगे तो जवाब होता है कि ‘जनाब 20 रुपए में तो इस लाइट की तार भी नहीं आएगी और ऊपर से तार के साथ इसका सॉकेट, अलग-अलग रंग के छोटे-छोटे बल्बों का खर्च अलग। अब यहां मुझ जैसे सामान्य लोगों के सामने यह तो प्रश्न लाजमी आएगा कि महीने भर की कमाई को बचाने के लिए अगर मुझे ‘मेड इन चाइना’ सामान खरीदना पड़े तो हर्ज ही क्या है!
यह तो रही सामान्य नागरिक की बात। अगर एक अर्थशास्त्री के दृष्टिकोण से देखें तो इतने बड़े अंतर का राज समझ आएगा। असल में जिस उत्पाद की बात हमने ऊपर की है उस जैसे उत्पादों के निर्माण में छोटे-छोटे कारखाने विशेष महत्त्व रखते हैं, जिनका भारत के तथाकथित राजनीतिकों और नीति निर्माताओं ने तरह-तरह के कर लगा कर खून चूस लिया है।
भारत में जिस मुद्रा बैंक, कौशल विकास, कौशल निर्माण संस्थान आदि की शुरुआत अब हुई है, ऐसे अनेक कार्यक्रमों की शुरुआत चीन जैसे देशों में 1990 में हो गई थी। ऐसा नहीं है कि ‘मोदीनोमिक्स’ के कारण ही इन कार्यक्रमों का विकास हुआ है, ये सब किसी न किसी रूप में पूर्ववर्ती सरकारों ने भी शुरू किए थे, हां उनका असर क्या हुआ, यह विश्लेषण का विषय है।
अब अगर किसी सामान्य परिवार में तीन भाई हैं और उनमें से एक भी ऐसे उत्पादों का निर्माण करता है तो निश्चित रूप से बाकी बचे दो भाई उससे वह उत्पाद लेने से पहले यह जरूर सोचेंगे कि आखिर यह इतना महंगा क्यों दे रहा है? अगर वे दो भाई चाइना मेड सामान खरीदते हैं और उनके देशप्रेम पर प्रश्न उठाया जाता है तो हुआ न उनके देशप्रेम पर जेबप्रेम हावी!
’सत्य देव आर्य, मेरठ</strong>
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