केंद्र सरकार ने महत्त्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी योजना के तहत अट्ठानबे स्मार्ट शहरों के निर्माण की घोषणा की है। सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश के तेरह शहर शामिल हैं, और अन्य राज्यों के भी शहर शामिल हैं। बेशक यह कागज से उतर कर धरातल पर साकार हो पाए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भारत की साठ प्रतिशत जनसंख्या गावों में निवास करती है। जिनके आजीविका का प्रमुख साधन कृषि और इससे जुड़े उद्योग-धंधे होते हैं। उनकी स्थितियां और समस्याएं महानगरों से अलग हैं। स्वास्थ्य सुविधाएं देशभर में सुचारु रूप से पहुंच नहीं पा रही हैं।
समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों को शिक्षा सहज उपलब्ध नहीं है। उन्हें स्मार्ट सिटी से क्या लाभ मिलेगा?
वर्तमान में देश के मेट्रो शहरों की हालत किसी से छिपी नहीं है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, बंगलुरु और चेन्नई का निवासी पार्किंग और भीड़ की समस्या से जुझते नजर आता है। बहरहाल, प्रयास यह करना होगा कि एक लाख करोड़ की लागत वाली योजना के निजीकरण में सार्वजनिक लाभ ही प्राथमिक हो, भ्रष्टाचार नहीं। अगर यह योजना कामयाब हुई तो, पूरे देश की तकदीर संवर जाएगी।
पवन मौर्य, लंका, वाराणसी
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