वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी पार्टी विशेष को हमें (नागरिक को) नैतिकता के उच्चतम मानदंड पर कभी नहीं बिठाना चाहिए, क्योंकि इनका अंतिम धेय सत्ता की प्राप्ति होती है, बाकी जितनी भी बातें हैं वे सिर्फ दिखावटी और बनावटी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में सत्ता हासिल करने के लिए न सिर्फ राज्यपाल के पद का दुरुपयोग किया, बल्कि राष्ट्रपति शासन को ‘बीजेपी शासन’ बना दिया। शिवसेना सोच रही थी कि इस बार हमारे हाथ वो नंबर लगा है कि जो पूरे महाराष्ट्र की राजनीति का संचालक हमें ही बना देगी, लेकिन उन्हें क्या पता कि भाजपा के पास इस समय सत्ता की ताकत है। शरद पवार भी राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हैं, ऐसे में महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार उन्होंने ऐसे ही नहीं बनने दी होगी। इसे लेकर देश भर में लोगों के मन में क्या-क्या सवाल उठ रहे होंगे, कल्पना भी नहीं की जा सकती। अब तो मन में यही प्रश्न उठता है कि लोकतंत्र में वास्तव में जनता सर्वोपरि है या सत्ता? कौन सही है और कौन गलत, इसका निर्णय कौन करेगा? सही मायने में ऐसे प्रश्न को समय पर छोड़ देना चाहिए। फिलहाल तो जनता सबसे ज्यादा ठगी हुई प्रतीत हो रही है।
’कन्हैया लाल पांडेय, नरेला, दिल्ली
संकीर्ण मानसिकता
हमारे देश की एकता को सुनिश्चित और सुदृढ़ करने के लिए धर्मिक, सामजिक और राजनीतिक कट्टरता से ज्यादा जरूरी सभी वर्गों के लोगों के मध्य आपसी भाईचारा और प्रेम और सौहार्द है। आपसी भाईचारे और धार्मिक एकता की बात तो सभी करते हैं, लेकिन उसके रास्ते पर चलने की जब बात आती है तो अनावश्यक कट्टरता को आगे कर देते हैं, मानो यह कट्टरता ही सब कुछ है, यही विविधता में एकता को सच्चे मायने में नहीं स्थापित होने देती, और यही है, जिसे देश की एकता को ध्यान में रख कर संविधानवेत्ताओं ने धर्मनिरपेक्षता को संवैधानिक रुपे से अनिवार्य किया था।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति को संस्कृत का सहायक प्राध्यापक नियुक्त करने के कारण हो रहा विरोध इस बात का जीवंत प्रमाण है कि अब हमें धर्म निरपेक्षता पच नहीं रही है। कभी पहले ऐसा नहीं हुआ था कि देश के विद्यालयों / विश्वविद्यालयों में जाति और धर्म के अनुसार अध्ययन-अध्यापन के लिए विषयों का चयन हो। सीधी-सी बात है कि उक्त चयनित प्राध्यापकने संस्कृत का ही अध्ययन किया होगा, उसी में उच्च उपाधि प्राप्त की, तभी तो चयन प्रक्रिया के अनुसार उनकी नियुक्ति हुई। इस बात का विरोध तो तब सार्थक कहा जा सकता है, जब वे अध्यापन के दौरान धर्मिक और सामुदायिक एकता को खंडित करने की बात करते। केवल अल्पसंख्यक वर्ग का होने के कारण वे संस्कृत नहीं पढ़ा सकते, इस प्रकार की सोच भारतीय नहीं हो सकती। इस तरह की छिछली मानसिकता वालों को हिंदी साहित्य के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए जहां बहुत से मसुलिम कवियों ने राम और कृष्ण को अपना काव्य विषय बनाया।
’राजेंद्र प्रसाद सिंह, दिल्ली</p>

